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बागड़बिल्लों का नया धंधा



प्रधानमंत्री कह रहे हैं हमारी सीमा में कोई नहीं घुसा। अप्रधानमंत्री कह रहे हैं दुश्मन हमारी सीमा में घुसा। रातों-रात देश में लाखों सीमा विशेषज्ञ उग आए हैं। फौज के भर्ती दफ्तरों पर भीड़ नहीं है पर टीवी चैनलों पर बहसवीरों का मेला लग गया है। अंधेरा रात में होता है पर देश में दिन में अंधेरा फैल रहा है। चीन को सही रास्ते पर लगाने की कोशिशें जारी है पर कुछ बागड़बिल्ले मानते हैं कि अंधेरे के लिए सरकार दोषी है। भारत और चीन के बीच कोई पक्की सीमा होती तो फिर विवाद था ही कहां? सीमा को लेकर चीन का बर्ताव बंदर की तरह है, वह जिधर मर्जी होती है कूद जाता है। सीमांकन की जब भी बात चलती है, वह बच्चों की तरह हर बार नई और नाजायज मांग रख देता है। न कभी अपना पूरा नक्शा देता है न विवाद का हल चाहता है। वह विवाद बनाए रखना चाहता है, ताकि हमारे प्रधानमंत्री से अप्रधानमंत्री लड़ते रहें। बंदर अंधेरा रचकर लाभ उठाता रहे। कोरोना का भय कम हुआ तो राजनेता अपने नये धंधे में लग गए हैं। उनका नया धंधा है सीमा का भ्रम फैलाना और जनता को उलझाये रखना।

अभी ट्वीटपति का ट्वीट आया। आप भी क्या मज़ाक करते हैं, इक्कीसवीं सदी में रहते हैं और ट्वीटपति को नहीं जानते। ट्वीटपति सोते-सोते ट्वीट करके दुनिया का हुलिया बदल देते हैं। उन्होंने लिखा है कि इस अंधेरे के लिए विस्तारवादी देश दोषी है। सारी दुनिया में कोरोना फैलाकर चीन कई देशों का पैसा और जमीन हड़पना चाहता है। ईरान अंधेरा रचाकर इराक में अमेरिकन ठिकानों पर हमले कर रहा है। मैं इस ट्वीट से उबर भी नहीं पाता कि व्हाट्सऐप पर संदेसे आते हैं, पड़ोसी पाक की फ़ौज ने भी अंधेरे का सृजन किया है। वे भारत की सीमा में घुसपैठिये मच्छर और टिड्डियां भेज रहे हैं। सब और भ्रम ही भ्रम है। यह भ्रम अंधेरा है या अंधेरा भ्रम है, कुछ समझ में नहीं आ रहा। यह बागड़बिल्लों के हाथ में है, जो दुश्मन हैं वे अंधेरा फैला रहे हैं, जो अपने हैं वे भ्रम फैला रहे हैं। जनता जो कहीं नहीं है वह वायरस के भय और सीमा के भ्रम में जी रही है। जनता डरती हुई सोच रही है कि जब चीन हमारी सीमा में घुसा ही नहीं तो तो दो किलोमीटर पीछे क्यों भागा? हमारी फौज क्यों पीछे हटी? अरे कबड्डी खेलते हैं तो टीमें मध्य रेखा पर ही खड़ी रहती हैं क्या? दूर-दूर खड़ी रहती हैं और विरोधी की हरकत पर नजर रखती हैं। राजनीति ने भ्रम का ऐसा अंधेरा फैला दिया है कि सच दिखता ही नहीं। सब एक दूसरे को ताक रहे हैं पर कह नहीं पा रहे कि ओ बहसियों, भ्रम की भांग के नशे में नियंत्रण रेखा समझाना बंद करो। सरकार को लगता है विपक्षियों ने देश को पहले नोच खाया। विपक्षियों को लगता है सरकार बिना दिमाग के दौड़ रही है। राजनीति को देश और जनता के लिये सोचने की फुरसत नहीं है। विचारधारा का पायजामा पहने हो तो क्या, मतलब हो तो सब ढँका रखते हो, मतलब निकलते ही देश के प्रति निष्ठा नंगेपन में क्यों बदल जाती है?

आम जनता को भ्रमित करना और भ्रमित बनाए रखना वैश्विक राजनीति का नया अस्त्र बन गया है। अंधेरे और भ्रम का यह घटाटोप भारत में ज्यादा गहरा है। बागड़बिल्ले देश को बचाने के नाम पर अलग-अलग तरह का भ्रम फैलाते रहे हैं, कुछ संविधान को बचाने का भ्रम फैलाते रहे हैं तो कुछ भाषा या धर्म को बचाने का। छोटे बागड़बिल्ले, बड़ों के बयानों का पुनः प्रसारण करते हैं और मीडिया उन्माद फैला कर टीआरपी लपेटते हैं। वे जानते हैं भ्रम का अंधकार फैलाने से जनता अपनी प्राथमिकताएँ भूल जाती है। भीड़ में भ्रम घुस जाए तो आप भीड़ को नहीं संभाल सकते। बेरोज़गार सोचते हैं अभी तो अंधेरा है मुँह ढँक कर सो जाओ, वायरस से मुक्ति मिलेगी तो सवेरा होगा तब रोज़गार दफ़्तर खुलेंगे। उद्योग सोचते हैं अभी तो अंधेरा है, लाइट आएगी तो मजदूर लौटेंगे तब कल-कारखाने चालू होंगे। किसान को फ़िक्र है यह कितनी लंबी रात है, बिना सूरज के फसलें पनपेंगी कैसे और अंधेरे के मावठे में कितनी फसल बर्बाद हो जाएगी। कोरोना और अब छिछली राजनीति ने कृत्रिम अंधेरा रच दिया है। कई जगह बाजार बंद हैं। जो दुकानें खोल रहे हैं भ्रम फैलाने वाले उन्हें समझा रहे हैं, इतने अंधेरे में कोई ग्राहक नहीं आएँगे। दुकानदार जानते हैं सनद प्राप्त लुटेरे आएँगे, भ्रम फैलायेंगे और लूट जाएँगे।

सरकारी दफ़्तरों की चांदी है, अंधेरा है तो सब जायज़ है। काम नहीं करो तो टोका-टाकी करने वाला कोई नहीं है, जिसको काम करवाना है वह तो घुप्प अंधेरे में भी रास्ता ढूँढ लेता है। हर जगह अंधेरा फैलाने वाले लोग अधिक हैं, उजाला लाने वाले कम। थोड़े-से लोग जो उजाला फैलाने की हिम्मत करके आते हैं, अंधेरा उन्हें लील लेता है। बागड़बिल्लों की खाल बहुत मोटी है। बेचारी जनता खाल कहाँ से लाये, उसकी चमड़ी घिस-घिस कर और पतली हो गई है। बागड़बिल्लों का क्या, इनमें से बहुत-से अपराध की दुनिया से निकल कर सुरक्षित स्वर्ग की तलाश में राजनीति में घुस आए हैं। वे जहाँ जो दिखा अपना समझ कर हड़प लेते हैं और पचा जाते हैं। भय, भ्रम और अंधेरे के माहौल में खड़ी जनता अपने समय के इंतजार में है।

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