www.dharmtoronto.com व्यंग्य सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?

सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?



इन दिनों पुलिस की पूछताछ चल रही है। पुलिस वालों को पुलिस वाले ही डंडे मार रहे हैं और जनता देख रही है। अख़बार वाले छाप रहे हैं। सरकार कुछ करने के बजाय खट्टे-मीठे चटखारे ले रही है। अभी तक पुलिसगण रिश्वत खाते थे, अब बलात्कार भी करने लगे हैं। पहले ज़िन्दा अख़बार जलाते थे, अब ज़िन्दा आदमी जलाने लगे हैं। पहले वकीलों के संग आँख लड़ाते थे, अब हाथ-पाँव लड़ाने लगे हैं। पुलिस वाले पहले सरकारी कर्मचारी थे, अब ख़ुद को ईदी अमीन और गृह मंत्री समझने लगे हैं। हमारे यहाँ आवारा पशुओं को काँजी हाउस में और आवारा आदमियों को थाने में रखने की व्यवस्था है। पुलिस वालों को थाने के आस-पास रखने का कुछ यही कारण लगता है।

बिना वर्दी के पुलिस वाले ताबूत लगते हैं। वर्दी उन्हें सामाजिक मान्यता देती है इसलिए वे घर में भी वर्दी पहन कर सोते हैं। रात-दिन चोरों, उठाईगिरों में रहने के कारण उनकी नस्ल बदल गई है। वे अब बदला-बदला व्यवहार करने लगे हैं। लोग पुलिस को मौके की तलाश में रहने वाला चलता–पुर्ज़ा कहते हैं। कुछ समय पहले की बात है, तब मेरे कपड़ों में जेबें थी। जेब में रुपये होते थे एक दिन मेरी जेब कटी। जेबकतरा भागने लगा। मैं चिल्लाने लगा। सारा नगद, नारायण हो गया था। मैंने आँखें बन्द कर प्रभु स्मरण किया। आँखें खोलीं तो साक्षात प्रभु खड़े थे, पुलिस वेशभूषा में। वे मुझे थाने ले गए। रपट लिखी। मैंने उन प्रभु को प्रसाद चढ़ाया, प्रभु प्रसन्न नहीं हुए, उन्होंने और प्रसाद माँगा। मेरी दूसरी जेब प्रसाद में खाली हो गई। न जेबकतरा मिला, न प्रभु ही लौट कर आए। तब से मैं पुलिस को राम की माया मानता हूँ। धर्मग्रन्थों में प्रभु के तैंतीस करोड़ अवतार माने गए हैं। पुलिस-प्रभु पंचनामा लिखते, गाली उच्चार करते, वलन-समाचार पढ़ते और जादुई डंडे के क़रतब दिखाते, यदा-कदा टॉकिज़ों और बस स्टैंड पर लाइन सीधी करवाते हुए मिल जाते हैं। इस दैनिक लीला से ये तनख़ा से चार गुनी ग़ैर-सरकारी तनख़ा पका लेते हैं। सरकार की दस हज़ार रुपट्टी तो ये और इनकी मोटर साइकिल ही पी जाती है।

पुलिस का काग़ज़ी उद्देश्य जनसेवा और देशभक्ति है। वे ख़ाकी नेकर और कमीज़ में लट्ठ बजाते हैं तो जन सेवा हो जाती है। सोने के बिस्कुट और अफ़ीम की ट्रकें रातों-रात पार करवा कर ये गेहूँ के दस-बीस थैले पकड़ लेते हैं। ये इसे देशभक्ति मानते हैं। पुलिस की फ़ुर्ती और चतुराई बेमिसाल है। नेताजी के घर पन्द्रह- बीस हज़ार रुपयों की चोरी हो जाए तो पच्चीस-पचास लोगों को पकड़ लाते हैं। गाँव में डकैती डल जाए तो इन्हें सिर्फ़ खाली पेटियाँ ही गाँव के बाहर मिल पाती हैं। बस और ट्रेन लुट जाएँ तो ये जंगल का चप्पा-चप्पा छान कर बकरे और मुर्गे पकड़ लाते हैं। चोरी-डकैती, लड़ाई-झगड़े और दंगे-फ़साद होते रहें तो इनकी दाल-रोटी निकल जाती है। अन्यथा तंगी में बाबा रविशंकर शुक्ल के ज़माने की टेबल-कुर्सी निकाल कर थाने के सामने बैठ जाते हैं। जनरल चेकिंग भी करते हैं और मंदिर का चन्दा भी वसूल लेते हैं। दौरों में मंत्रियों के आगे-पीछे मंडराते हुए पुलिस वाले मंत्री को इज्ज़तदार बनाते हैं। सिविल कपड़ों में इनकी सभा में भीड़ भी बढ़ाते हैं। पुलिस निश्चित ही सरकार की बिगड़ी संतान है। ख़तरे के वक़्त सरकार पुलिस को कोसती है और ऐसा बजाती है जैसे पुलिस इंसान नहीं विधानसभा की टेबलें हो। अन्य दिनों में पुलिस फिर शेर हो जाती है और सरकार मिमियाने लगती है।

धर्मग्रन्थों में प्रभु के तैंतीस करोड़ अवतार माने गए हैं। पुलिस-प्रभु पंचनामा लिखते, गाली उच्चार करते, वलन-समाचार पढ़ते और जादुई डंडे के क़रतब दिखाते, यदा-कदा टॉकिज़ों और बस स्टैंड पर लाइन सीधी करवाते हुए मिल जाते हैं। इस दैनिक लीला से ये तनख़ा से चार गुनी ग़ैर-सरकारी तनख़ा पका लेते हैं। सरकार की दस हज़ार रुपट्टी तो ये और इनकी मोटर साइकिल ही पी जाती है।

पुलिस की वर्दी पहले सूती थी। वे तब कम सूतते थे। अब वर्दी मक्खन-डग और टेरीकॉट की हो गई, इसलिए ज़्यादा सूतते हैं। आजकल शराब के ठेकों की तरह थानों की भी बोलियाँ लगने लगी हैं। समझदार ऊँची बोली लगाकर कमाऊ थाना पा लेते हैं। इसमें असफल थानेदार, बेचारे, दूसरे दिन लाईन-अटैच हो जाते हैं। इसलिए सिपाही थानेदार के लिए रिश्वत लेता है। थानेदार सी. आय. साहब के लिए रिश्वत लेता है। सी.आय. के लिए डी.एस.पी देवता है और एस.पी. भगवान। वह उन्हें नेवैद्य चढ़ाता है। इस बड़े रावले में बहुत-सी हाथी पोलें हैं।

पुलिस ने फ्री में रोज़नामचे में रिपोर्ट लिखना बन्द कर दिया है। रिपोर्ट लिखने से वैसे भी उनकी छवि बिगड़ती है। अपराध-संख्या बढ़ जाती है। छवि के डर से पुलिस ख़ुफिया कुत्तों के साथ रहने लगी है। दोनों को छूत की बीमारी हो गई है। ज़्यादातर कुत्ते खूंखार हो गए हैं और पुलिस भौंकने लगी है। शराब, गांजा, भाँग, अफ़ीम और चरस की हल्की-सी गंध इनके दिमाग़ का जीरो बल्ब प्रज्वलित कर देती है। अबला नारी को देख ये पुरुषार्थी बन जाते हैं। इनके लिए क़ानून और व्यवस्था अचार और मुरब्बे जैसी हो गई है। उंगलियाँ चाटते हुए ये प्रजातंत्र को खाते-चबाते रहते हैं। हड़ताल, जुलूस, दुकानों की लूट-पट्टी और सिटी बसों के अग्नि-यज्ञ से पुलिस भी प्रभावित हुई है। वह आन्दोलन करने लगी है। नटवरलाल जेल से भाग रहे हैं, डाकू थाना लूट रहे हैं और पुलिस नारे लगा रही है ‘जो हमसे टकराएगा, हवालात में जाएगा।’

भैंस और पुलिस दोनों ही रास्ते में अड़े रहते हैं। भैंस कहने-सुनने पर रास्ता छोड़ देती है पर पुलिस दक्षिणा लिए बिना रास्ता नहीं छोड़ती। एक वाकया याद आ रहा है। उस दिन ऑटो से स्टेशन जा रहा था। पुलिस ने ऑटो वाले को बुलाया और कहा- क्यों बे भाई साहब, कहाँ जा रहे हो? मुझे इस वाक्य रचना पर हँसी आ गई। पुलिस वाले ने मुझे घूरते हुए कहा ‘सर क्यों दाँत फाड़ रहा है? वे बड़बड़ाने लगे ‘श्रीमान को दो झापड़ देंगे तो बत्तीसी बाहर पधार जाएगी।’ मुझे ध्यान आया पुलिस वाले शिष्टाचार सप्ताह मना रहे हैं। मैं चुपचाप सह गया। शिष्टाचार सप्ताह नहीं होता तो वे आदिम गालियों से मेरा अभिनंदन करते। ऑटो चालक समझदार था। रोजी-रोटी कमाना चाहता था सो उसने एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा सिपाही को थमा दिया। सिपाही ने लिफ़ाफ़ा खोला, लिफ़ाफ़े में फूँक मारी और नोट गिन लिए। मुझे लगा पुलिस को शिष्टाचार सिखाना कोयले को साबुन से धोकर सफ़ेद करने जैसा है।

आम जनता की मनोकामना है, अब पुलिस को छवि सुधारना चाहिए। यह बात मैंने अपने मित्र पुलिस अधिकारी से कही। वे मूछों पर ताव देते हुए बोले ‘बरखुर्दार! कुत्ते की पूँछ सीधी हो सकती है पर….।

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