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आधुनिकता का चेहरा



मॉल में हमें कुछ ख़रीदना नहीं होता

चीज़ों को उलटने-पलटने और

कीमतें देखने के सिवा।

श्रृंगार कविता-सी सजी-धजी मॉल

फ़ुरसत के वक़्त में

रूमानी बना देती है

इसके चलते

कागज़ का अधिकृत टुकड़ा

अर्थशास्त्र बन जाता है।

मॉल में कई पीढ़ियाँ मिलती हैं

स्ट्रोलर से व्हीलचेयर तक की पीढ़ियाँ

भीड़ में बुद्ध के लिए यह बोधिस्थल है

और प्रबुद्ध के लिए

आधुनिकता का चेहरा

चीज़ों को देखने-छूने भर से

पहाड़-सी इच्छाएँ भरभराने लगती हैं

ज़रूरत के बिना

आधे से कम दाम पर भी ख़रीदार नहीं होते।

इच्छाओं का अवमूल्यन

बाज़ार को बेआबरू कर सकता है

इसलिए दुकानदार एक चीज़ ख़रीदने पर

सममूल्य दूसरी चीज़ भेंट करते हैं

कितने उदारमना हैं वे

जो नहीं बिकता

उसे मुफ़्त कह कर बेच देते हैं।

मॉल के एक कोने में

टीवी स्क्रीन पर चलते एक टॉक शो में

चर्चा चल रही है

भेड़ें अपने झुंड में चलती हैं

पक्षी अपने झुंड में उड़ते हैं

बतखें अपने झुंड में तैरती हैं

आदमी झुंड बना कर ठगते हैं

आदमी सामाजिक प्राणी है।

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