www.dharmtoronto.com कविताएँ,लेखन बादलों को चखने का समय

बादलों को चखने का समय



जब बारिश में भीगना चुनता हूँ

बेपरवाह हो जाता हूँ

नहीं देखता तब

कि कितना भरा है बादल

कितनी तीखी हैं बौछारें

कितनी तेज़ है हवा।

अभिषेक की धार देखने के लिए

ध्यानमग्न हो जाती हैं आँखें

मुँह अपने विस्तार में होता है

दाँतों का व्यूह तोड़ जीभ

बूंदों को गटक लेती है

बादलों को चखने का यही समय है।

जब बारिश में भीगना चुनता हूँ

बड़भैया सड़क पर नाचता होता है

छोटू ऊँगली छुड़ा कर भाग जाता है

गुड़िया अपनी गुड्डी को दबाए

देहरी के भीतर चली जाती है

पिता डाँटना भूलकर हँसने लगते हैं

माँ का आँचल मेरा सिर ढाँपने लगता है।

कोई भी हो जगह देस-परदेस में

आँगन-सी दिखने लगती है

जब भी बारिश में भीगना चुनता हूँ

बचपन में लौटना चुनता हूँ मैं।

(2)

बारिश की इबारत में अब तुम शामिल हो

रिमझिम के मायने बदल गए हैं

फुहारें मुझे छू कर बिखरती हैं तो लगता है

अपनी बहुत-सी कलाएँ तुमने सिखा दी हैं इन्हें।

तुम भीगो तो भीगने को करता है मन

तुम भीगो तो हँसी तैर आती है

तुम भीगो तो धरती गोल-गोल घूमती है

तुम भीगो तो मौसम गीत बुनता है।

तुम्हारे साथ

जब बारिश में भीगना चुनता हूँ

युवा होकर फिर से जीना चुनता हूँ मैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *