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जंगल : सरकारी जंगले में



आला अफ़सरों के जंगले में हर सरकारी नीति जंगल होती है। फिर, जंगल बीड़ में बदल जाता है। और अफ़सरान अपने पालतू चमचों के माध्यम से सारी बीड़ चर जाते हैं। इन दिनों देश में जंगल लगाने का काग़ज़ी काम ज़ोर-शोर से चल रहा है। सच पूछें तो देश को जंगल बनाने की कोशिश में अफ़सरान लगे हुए हैं। हमारे अफ़सर-तंत्र में विलक्षण प्रतिभा है, बुद्धि है और ठसपन है। वे काम करना चाहें तो हनुमान जी की तरह तमाम क़ानूनों का पर्वत अपनी उंगली पर उठा कर ले जा सकते हैं और वे काम करना न चाहें तो क़ानून का धनुष कोई टस से मस नहीं कर सकता।

जंगल लगाओ अभियान की शुरुआत करने के पूर्व पिछले दिनों एक विशेष बैठक हुई इस बैठक में चपरासी से लगा कर आयएएस सचिवों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य था जंगल के बजट पर चर्चा करना। हर अफ़सर चाहता था जंगल के लिए जितनी अधिक से अधिक रकम खींची जा सके खींच ली जाए। वे जानते थे सरकारी नीति चार दिन की चाँदनी जैसी है, क्या मालू्म कब चार दिन पूरे हो जाएँ। इसलिए बैठक में यह तय किया गया कि सभी विभाग जंगल लगाने के लिए एक-एक डीजल जीप लाएँ। स्टेनों और अर्दलियों को तदर्थ नियुक्तियाँ दें और सारा बजट ऊपर ही ऊपर ख़त्म कर दें।

बैठकियों में कुछ परीवीक्षाधीन अधिकारी मतलब प्रॉबेशनरी अफ़सर थे। वे तंत्र में नए-नए आए थे, उन्हें जिज्ञासा हुई। उन्होंने पूछा “इस तरह जंगल का बजट ग़ैर-जंगल खाते में ख़र्च हो जाएगा। सरकार जब जंगल की प्रगति के बारे में विधानसभा को बताना चाहेगी तब हम जंगल कहाँ बताएँगे?”

बैठकियों में कुछ परीवीक्षाधीन अधिकारी मतलब प्रॉबेशनरी अफ़सर थे। वे तंत्र में नए-नए आए थे, उन्हें जिज्ञासा हुई। उन्होंने पूछा “इस तरह जंगल का बजट ग़ैर-जंगल खाते में ख़र्च हो जाएगा। सरकार जब जंगल की प्रगति के बारे में विधानसभा को बताना चाहेगी तब हम जंगल कहाँ बताएँगे?”

एक वरिष्ठ अफ़सर ने उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा “जब सरकार जंगलों के बारे में पूछताछ करेगी तब हम सरकार को सलाह देंगे कि जंगल लगाना वन विभाग का काम है। वन विभाग के पास वनों के विशेषज्ञ हैं। डीएफओ हैं, रेंजर हैं, फारेस्ट गार्ड हैं। ये लोग जंगल नहीं लगाएँगे तो क्या मक्खियाँ मारेंगे? सरकार वन विभाग से पूछेगी, ‘कितने जंगल लगे?’ इस प्रश्न का उत्तर देने दूसरे अफ़सर खड़े हुए। उन्होंने कहा “जब सरकार हमसे जंगलों के बारे में पूछेगी, हम आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखेंगे ‘जंगल, कैसे जंगल, कौन से जंगल?’ हम तो जंगल सहेजते हैं, उनकी रक्षा करते हैं और लोगों को सिर्फ़ जलाऊ लकड़ी काटने का परमिट देते हैं। जंगल लगाना शायद कृषि विभाग का काम होगा। उनके पास उन्नत बीज हैं, उन्नत कलमें हैं, खाद हैं, कीटनाशक हैं, ग्राम सेवकों की पलटन हैं। इतना होने पर भी यदि वे जंगल नहीं उगाएँगे तो क्या बोइंग-747 उगाएँगे?”

परीवीक्षाधीन अधिकारियों ने कृषि विभाग के आला अफ़सर की ओर प्रश्नवाचक निगाह से देखा। वे मुस्कुराते हुए आक्रामक हो गए और कहने लगे “जब सरकार हमारा कम्पोस्ट-द्वार खटखटाएगी तब हमारी सेना टिड्डियों को भगाने वाली मुद्रा में चिल्लाएगी। हम सब कहेंगे जंगल सार्वजनिक उपयोग की चीज़ है। जंगल थोक मात्रा में चाहिए। हम तो एक-दो प्रदर्शन प्लाटों में जंगल लगा सकते हैं। थोक मात्रा में जंगल लगाने का कार्य लोक निर्माण विभाग ने किया होगा। वे बिल्डिंग से लगा कर मलवा तक बना सकते हैं। सड़क के किनारे छायादार वृक्ष लगाने का काम भी उनके ज़िम्मे है।” उन्होंने लम्बी साँस ली और बैठ गए।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे प्रमुख अफ़सर ने कहा “हमें अपने अफ़सरानों के चातुर्य पर पूरा विश्वास है। लोक निर्माण विभाग वाले इस बात को इतने ही तर्क संगत ढंग से स्वास्थ्य विभाग पर टाल सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग इसे स्वायत्त संस्थाओं के गले मढ़ सकता है। विभाग दर विभाग जंगल लगाओ अभियान की फाइलें दौड़ सकती हैं और फाइलों का ही एक नया जंगल बन सकता है। नए अफ़सर घबराएँ नहीं, हमारा सांख्यिकी विभाग हर किस्म के आँकड़े सरकार को दे सकता है। सूचना और प्रकाशन विभाग के ढोलकिए ढोल पीट-पीट कर जंगल लगाओ अभियान के सचित्र समाचार प्रकाशित करा सकते हैं। इसके बाद हम भी ख़ुश, सरकार भी ख़ुश।”

हाल में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। प्रमुख अफ़सर के तर्कों ने परीवीक्षाधीन अधिकारियों की जिज्ञासा शांत कर दी। तभी उनमें से एक ने पूछा सर जब जनता जंगल में जंगल ढूँढेगी और पूछेगी कहाँ लगे नए पेड़, तब हम क्या करेंगे? करोड़ों रुपयों का हिसाब दे सकना तब कितना मुश्किल होगा?

हाल में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। प्रमुख अफ़सर के तर्कों ने परीवीक्षाधीन अधिकारियों की जिज्ञासा शांत कर दी। तभी उनमें से एक ने पूछा सर जब जनता जंगल में जंगल ढूँढेगी और पूछेगी कहाँ लगे नए पेड़, तब हम क्या करेंगे? करोड़ों रुपयों का हिसाब दे सकना तब कितना मुश्किल होगा?

सारे अनुभवी अफ़सर बुक्का फाड़ कर हँसने लगे। प्रमुख अधिकारी ने कहा “इस देश में इतनी फ़ुर्सत किसी को नहीं है जो जंगल में जंगल ढूँढे। फिर भी, नए अफ़सरों की जिज्ञासा है इसलिए उसे शांत किया जाना चाहिए। ऐसी समस्याएँ हमारा चपरासी नन्नूलाल निपटा सकता है।” उन्होंने नन्नूलाल को इशारा  किया। वह कहने लगा “सा’ब, हम ख़बर फैला देंगे कि जंगल में आग लग गई। दो दिन में आग पर काबू पाया गया। सरकारी अमले ने रात-दिन एक कर जंगल की आग सफलता पूर्वक बुझा दी। आग इतनी भीषण थी कि लकड़ी राख-राख हो गई और अरबों रुपयों का नुक़सान हो गया।” सब निश्चिंत हो गए कि न उन्हें जंगल लगाना है न आग बुझाना है। उन्हें तो ऐसा काम करना है कि देश की प्रगति दिखे और वे बजट हज़म कर डकार भी न लें।

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