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क़लमकार! नारे रचो



गोष्ठीजीवी साहित्यकारों, बहुत दिन हो गए होंगे साहित्य रचे। कोई नया वाद ही नहीं निकाला। बिना वाद के वाद-विवाद नहीं होता। लिखो भी तो क्या? परजीवी संपादकों, महीनों हो गए होंगे कुछ नया साहित्य पढ़े। नए साहित्यकार घटिया लिखते हैं उन्हें क्या पढ़ना? जमे हुए साहित्यकार मंजा हुआ लिखते हैं, उनको भी क्या पढ़ना? पढ़ने के लिए कुछ भी नहीं बचता। पत्रकारों, आपने ख़बर का नाम ही सुना होगा क्योंकि ख़बर के नाम पर सब कुछ सूचना प्रकाशन विभाग द्वारा लिखा होगा। आप सब के लिए एक ख़ास बात है सचेत हो जाओ और पढ़ो। ज़ोर से पढ़ो ताकि ख़ुद भी सुन सको। इस देश में नए नारों की ज़रूरत है, नारे रचो। हे क़लमकार! उठाओ क़लम, जलाओ धूम्र दंडिका, चढ़ाओ शिवप्रसाद और घिसो। पुराने नारों पर रद्दा घिसो। चमकाओ, नया बनाओ या विदेशी नारों का भारतीयकरण करो। इस देश में नए नारों की सख्त ज़रूरत है।

सरकार हरकारों की हो या चमचों की। वोटों की हो या तमंचों की। सरकार का काम है सोये रहना या अपने लोगों में खोए रहना। जनता का फ़र्ज है नया नारा लगाए। जैसे ‘बेड़ा गर्क हो रहा है, देश नर्क हो रहा है तब सरकार हड़बड़ाएगी, देखेगी, उसे लगेगा उसका सिंहासन डोल रहा है, वोटर सरकार के विरुद्ध बोल रहा है। सरकार एक कार्यक्रम देगी, नया भ्रम देगी। उसमें कुछ सूत्र होंगे। यह भी एक नया नारा होगा, कामचोर सरकार का सहारा होगा। जनता को लगेगा अब कुछ काम होने वाला है। वह चुप हो जाएगी। जनता की चुप्पी से सरकार भी चुप हो जाएगी। फिर वही मस्ती होगी, चमचों की बस्ती होगी।

लोगों ने आपात काल में आपात नारे लिखे। ट्रकों पर लिखे, ठेलों पर लिखे, मूत्रालयों और मंत्रालयों में लिखे। सारा देश नारा हो गया। सरकार बदली, क्रान्ति के नारे लोगों ने पोत दिए। अनुशासन का नारा, जेब में रख लिया। मुझे दुःख है और आपको भी होना चाहिए कि नारे मिटे और अनुशासन मिट गया। देश वहीं का वहीं रह गया। प्रगति का दायित्व नारों का है। पुराने नारे ख़त्म हो गए हैं। नारा नहीं होगा तो न ‘क्यू’ होगी, न राशन होगा, न अकर्मण्यों का सिंहासन होगा। अतः हे क़लम के धनी उठाओ क़लम और लिखो, कमज़ोर सरकार को सहारा दो, निठल्ले लोगों को नारा दो।

लोगों ने आपात काल में आपात नारे लिखे। ट्रकों पर लिखे, ठेलों पर लिखे, मूत्रालयों और मंत्रालयों में लिखे। सारा देश नारा हो गया। सरकार बदली, क्रान्ति के नारे लोगों ने पोत दिए। अनुशासन का नारा, जेब में रख लिया। मुझे दुःख है और आपको भी होना चाहिए कि नारे मिटे और अनुशासन मिट गया। देश वहीं का वहीं रह गया। प्रगति का दायित्व नारों का है। पुराने नारे ख़त्म हो गए हैं। नारा नहीं होगा तो न ‘क्यू’ होगी, न राशन होगा, न अकर्मण्यों का सिंहासन होगा। अतः हे क़लम के धनी उठाओ क़लम और लिखो, कमज़ोर सरकार को सहारा दो, निठल्ले लोगों को नारा दो।

नारा विटामिन का इंजेक्शन है। लगते ही जोश आ जाता है। सीधे-सादे लोग प्रतिक्रियावादी बन जाते हैं। सड़कें भीड़ बन जाती हैं। नर में ‘आ’ लगा यानि कुछ बढ़ा। बना नारा। नारी का अवमूल्यन किया बना नारा। दोस्त, नर और नारी के बीच की चीज़ है नारा, वैसी ही क्रान्ति का प्रतीक है नारा। नारे में क्षमता है मुर्दाबाद की, नारे में प्रतिभा है ज़िन्दाबाद की। नारे से आदमी अमर रहता है, नारे का वंशानुगत असर रहता है। इतनी महान कला के बारे में साहित्यकारों को किसी ने दिशा नहीं दी। मैं दे रहा हूँ। कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, लेख से भी ऊँचा है नारा जैसे ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’।

क़लमकार दोस्तो, नाम प्रगति का पूजक है, अवनति का सूचक है। आप नारा लगाइए जय। गोबर गणेश महान हो जाएँगे, पत्थर भगवान हो जाएँगे। आप नारा लगाएँगे- हाय-हाय। लोग होश-हवाश खो जाएँगे। बड़े-बूढ़े रो जाएँगे। नारा चित्त-पट है, कभी हेड कभी टेल। बकौल इंदिरा गाँधी, नारा है समय की आँधी। नारा इसलिए नए युग के नए साहित्य की पहचान है। नारे में भूत, भविष्य और वर्तमान है। इसलिए क़लमकार, दौड़ो, नेताओं से नाता जोड़ो और नारे लिखो। जैसे हम प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं। आकाश से उतर रहे हैं, पाताल चढ़ रहे हैं। देशवासियों को लगेगा कि निःसंदेह अब हरामखोरी की बजाय सुविधाभोगी साहित्यकार काम करने लगे हैं। महाकाव्यों की जगह सार्थक नारे लिखने लगे हैं।

दोस्त, साहित्य तो सिर्फ़ समाज का दर्पण हैं। नारे सारे देश का दर्पण होते हैं, बहुत बड़ा दर्पण। इसलिए साहित्य से नारा बड़ा है। साहित्य करेला है तो नारा नीम चढ़ा है। मुआयना कीजिए। काँपते स्कूली अध्यापक बोलते हैं देश के बच्चे…. अधनंगे बच्चे हाथ तानते हैं, कहते हैं….. देश की दौलत। बच्चे ग़रीब, इसलिए देश ग़रीब। दूसरा मुआयना। हम जन्मतः संघर्षशील होते हैं। पैदा हुए, राग तोड़ी-फोड़ी में रोए। मणिपुरी शैली में हाथ चला, कत्थक में पाँव। सारा शरीर भरत नाट्यम करने लगा। माँ-बाप ने प्राथमिक शाला में भर्ती करवाया। संघर्ष की रिहर्सल शुरू। स्कूल का पहला दिन। टाटपट्टी एक, बच्चे सौ, क्या करो? एक दूसरे को धक्का दो। प्रभात फेरियों, जन्म दिवसों और हड़तालों के नारे लगाते हायर सेकेण्डरी में पहुँचो। कॉलेज में पहुँचो और शिक्षित होने का तमगा जेब में रख लो। अब रिहर्सल भी ख़त्म वास्तविक नाटक शुरू। बस में चढ़ना हो या टॉकीज में घुसना हो। गेहूँ लाना हो या घासलेट। लगाओ लाइन। करो संघर्ष। जन्मजात संघर्ष हमारा नारा है कर लो इसको पक्का और लगा दो धक्का। हर समस्या का हल है नारा, जनता की अगन है नारा।

इसलिए क़लमकार नारे रच कर तुम आम आदमी से प्रतिबद्ध न हुए तो तुम्हारी कोई जात न होगी। नारे रच कर तुम सरकार से भी सम्बद्ध हो सकते हो। खा सकते हो, पी सकते हो। इस द्विधर्मिता के कारण नारा सृजन साहित्य रचना से महान है और तुम भी तो महान बनना चाहते हो। नारे में परिश्रम कम है सफलता ज़्यादा। गंगा बहाओ और हाथ धो लो। इसलिए उठो, नारे लिखो।

इसलिए क़लमकार नारे रच कर तुम आम आदमी से प्रतिबद्ध न हुए तो तुम्हारी कोई जात न होगी। नारे रच कर तुम सरकार से भी सम्बद्ध हो सकते हो। खा सकते हो, पी सकते हो। इस द्विधर्मिता के कारण नारा सृजन साहित्य रचना से महान है और तुम भी तो महान बनना चाहते हो। नारे में परिश्रम कम है सफलता ज़्यादा। गंगा बहाओ और हाथ धो लो। इसलिए उठो, नारे लिखो।

हम सिर्फ़ नारा लिखने के लिए ही जन्मे हैं। लड़ने के बीज बचपन में उगे और जवानी में फले-फूले। याद आता है हमने जोश में तेज़ तर्रार नारा लगाया था। जो हमसे टकरायेगा, मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए देश में मिट्टी ही मिट्टी है। चीन टकराया था तब हम शांति के नारे लगाते रहे थे, वे बंदूकें चलाते रहे थे। फिर पाकिस्तान ने ज़ोर आजमाया। हमने यही नारा ज़ोर से लगाया, दोहराया। पाकिस्तान हारा, इतना बुलंद था हमारा नारा। नारा दुश्मन के लिए है तो दोस्त के लिए भी। हम तो हर किसी के लिए नारा लिख सकते हैं। नारा लिखा हिन्दी-रूसी भाई-भाई। रूस को दोस्त बना लिया। नारे न होते तो दोस्ती का इज़हार न होता, राजनैतिक संबंधों का संसार न होता।

नारा पूर्णतः भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। अहिंसावादी है। महावीर ने लगाया- ‘जीओ और जीने दो’ लोग ‘म्युच्युअल’ जीने लगे। आज ख़ुद खाते हैं, बॉस को खिलाते हैं, लोगों को कमाने देते हैं। गाँधीजी ने कहा- ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’। अंग्रेज़ों ने ऐसा नारा कभी सुना नहीं होगा। नारा सुन कर वे डर गए और भारत छोड़ भागते बने। गोया, नारा न हुआ एटम बम हो गया। इसलिए क़लमकार नारा लिखकर देश का बचा-खुचा नाम तुम भी रोशन कर दो। भावी पीढ़ियाँ तुम पर गर्व करेंगी।

नारा सर्वग्राही है। प्राध्यापक लगाते हैं, लड़के लगाते हैं, मज़दूर लगाते हैं, अफ़सर लगाते हैं। जनता लगाती है, विधायक लगाते हैं। नारे लगाने के लिए अकल की ज़रूरत नहीं। रटी-रटाई लाइन, रटा-रटाया जवाब। जैसे नेहरूजी अमर रहे, वैसे हर कोई नेता भी अमर रहे। नारे लिखने में अक़्ल भी नहीं लगती। इसलिए क़लमकार दोस्तो, मत चूको। सारे विश्व के लिए नारे लिख डालो। भारतीय इतिहास, ब्रिटेन वाले लिखते रहे हैं। विज्ञान अमेरिकन और रूसी लिख देंगे। अक़्ल का काम उन लोगों के लिए छोड़ नारे लिख डालो। मैं ज्योतिषी नहीं हूँ, फिर भी देश का भविष्य जानता हूँ। मशाल जुलूस, सायकल-स्कूटर रैली, विशाल आम सभा आज सभी नारे की मोहताज हैं।

अमेरिकन बच्चा हवाबाज़ बनेगा, कुवैती तेल-बाज़ बनेगा, वैसे ही भारतीय नारेबाज़ बनेगा। स्कूल, कॉलेज, नारेबाज़ी का तकनीकी प्रशिक्षण देंगे। पाठ्य-पुस्तकों में नारे होंगे, कुंजियों में नारों की व्याख्या होगी, ग्रंथों में नारों की समालोचना होगी। अतः क़लमकार तेल देखो, तेल की धार देखो और नारे लिखो। जिस तरह कवि रहस्यवादी, छायावादी और प्रयोगवादी कहे जाते हैं तुम नारावादी कहे जाओगे।

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