www.dharmtoronto.com लेखन,व्यंग्य साहित्य की सही रेसिपी

साहित्य की सही रेसिपी



इन दिनों साहित्य में रस नहीं रहा, निचुड़ गया है। साहित्य क्विंटलों में छप रहा है और सौ-दो सौ ग्राम के पैकेट में बिक रहा है। जगह-जगह पुस्तक मेलों में बिक रहा है पर रसिकों को मज़ा नहीं आ रहा। साहित्य को सर्वग्राही होना चाहिये, समोसे जैसा होना चाहिये। जहाँ प्लेटें उपलब्ध हों वहाँ साहित्य को समोसे खाते हुए पढ़ा जा सकता है, पर जहाँ प्लेटें न हों वहाँ साहित्य के ऊपर समोसा रख कर खाया और पढ़ा जा सकता है। समोसा, रसिकों को साहित्य से ज़्यादा आनंद देता है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि साहित्य को समोसा होना चाहिए, आइसक्रीम होना चाहिए, छप्पन भोग होना चाहिए ताकि रसिकों का पेट भर सके।

आप से कोई पूछे कि जलेबी में रस का क्या स्थान, तो आप क्या कहेंगे? रस हो तो इतना हो कि जलेबी रस भरी रहे। साहित्य में रस का सृजन ऐसे ही होना चाहिए, पाठक साहित्य देखे तो उसके मुँह में रस भर जाए। ऐसी रस पूर्णता ही पाठक को साहित्य का आसक्त बनाती है।

हलवाई जानता है कि उसे क्या बनाना है रसीले गुलाबजामुन, सूखे रस वाली काजू-कतली या चटपटी पानी-पूरी। वह जो भी बनाए, उसका उद्देश्य होता है रसिकों के मुँह में रस लाना। साहित्यकारों को हलवाई से अक्ल लेना चाहिए और पाठक को इतना लालायित कर देना चाहिए कि वह श्रृंगार रस का कवि देखे तो पाठक की लार टपकने लग जाए। साहित्य को इतना समर्थ होना चाहिए।

हलवाई जानता है कि उसे क्या बनाना है रसीले गुलाबजामुन, सूखे रस वाली काजू-कतली या चटपटी पानी-पूरी। वह जो भी बनाए, उसका उद्देश्य होता है रसिकों के मुँह में रस लाना। साहित्यकारों को हलवाई से अक्ल लेना चाहिए और पाठक को इतना लालायित कर देना चाहिए कि वह श्रृंगार रस का कवि देखे तो पाठक की लार टपकने लग जाए। साहित्य को इतना समर्थ होना चाहिए।

हमें साहित्य के नौ, दस या ग्यारह रसों के नाम गिनने की जरूरत नहीं है। सफल होना हो तो प्रेक्टिकल होना चाहिए। पुराने टाइप के रसों की रसानुभूति करने का क्या मज़ा! इक्कीसवीं सदी में नए रस साहित्य में लाएँ। रस ऐसे हों जो आपके भावों को उनके नाम की तरह उद्दीप्त कर दें, कभी आम रस की, कभी रसमलाई के रस की, तो कभी नींबू-पानी के रस की प्रत्यक्ष अनुभूति दें। पाठकों को ऐसे डायरेक्ट रस पसंद न हों पर वे रसानुभूति सिर्फ मुँह के भीतर ही चाहते हों तो उन्हें पकौड़े, कचौड़ी, चाट जैसे विकल्प मिलें जो सीधे रसेन्द्रिय को उत्तेजित करते हैं। साहित्य को ऐसा होना चाहिए कि चाहे उसमें रस प्रत्यक्ष दिखे न दिखे, पर वह रस पूर्ण हो। रस है तो रसिक है।

आलोचक कहते हैं साहित्य को लुगदी साहित्य नहीं होना चाहिए। ठीक है, पर मुख्य धारा के साहित्य में कुछ तो हो कि एक बैठक में खाने का मन करे। स्वादिष्ट हो तो हर माल खपता है, अनूदित साहित्य भी हिंदी में धड़ल्ले से खप रहा है। डोसा, इडली, सांभर सब खपता है। सांभर है तो, इडली-डोसे में रसोत्पत्ति है। यदि साहित्य के मूल अवयव में स्वाद न हो तो साहित्यकार को चाहिए कि वह उसमें पूरक सांभर मिलाए और रस उत्पन्न करे।

साहित्य में देसी या विलायती नशीले पेय रसों का स्थान गुप्त है। ये साहित्येतर रस हैं। ये सम्मेलनों और गोष्ठियों को अखाड़ा बना देते हैं। वैसे ही साहित्य में बहुत अखाड़े हैं, इनके पहलवान गुजर गए हैं पर भौतिक अखाड़े बचे हैं। साहित्य तो प्रेम का संवाहक है, प्रेम की जरा सी आँच मिले तो हृदय पिघल जाता है। इसलिए मुझे लगता है, साहित्य का स्थायी भाव आइसक्रीम जैसा बनना है। इसलिए आइसक्रीम को हमारे महत्तर साहित्य का अंग होना चाहिए।

शब्द ख़ुद-ब-ख़ुद अपना प्रतिष्ठित अर्थ बदल ले और दूसरा अर्थ अपना ले, इसे साहित्य में कहते हैं ध्वनि। जितने द्वि अर्थी संवाद हैं, वे हैं ध्वनि। जितने दलबदलू हैं वे हैं ध्वनि। इसलिए साहित्यकार को किसी एक खूँटे से बँध कर नहीं रहना चाहिए, खूँटे बदलते रहना चाहिए। जहाँ हरा चारा दिखे वहाँ मुँह मारना चाहिए। उसे रचना के भरोसे नहीं रहना चाहिये। जो रचना ख़ुद संपादकों को आकर्षित नहीं कर पाये, पाठकों को नहीं बाँध पाए, आलोचकों को नहीं रिझा पाए तो रचनाकर को सोचना चाहिए। उसे चाहिए कि वह अपनी रचना में पर्याप्त नुपूर बाँधे कि वाक्य ख़त्म होने से पहले ही पाठक झंकृत हो जाएँ। रचना में ऐसी ध्वनि हो, आरोह-अवरोह हो, राग-बंदिशें हो। अब व्यंग्यकार का यह काम तो नहीं कि वह बताए कहाँ क्या-क्या हो, पर जो भी चाहिए वह यथास्थान हो। शब्दों का अवमूल्यन न हो बस।    

पाठक साहित्य में अलंकार माँगते हैं। अलंकार भले कम हो, आटे में नमक जितना तो हो ही। साहित्य पढ़ो-सुनो तो लगे कि अलंकार का स्वाद आया। साहित्य देखो तो लगे कि कुछ अलंकार देखा। शास्त्रकारों ने आभूषणों से सुसज्जित नववधू का श्रेष्ठ अलंकार माना है लज्जा। अलंकारों से सुसज्जित साहित्यकारों में थोड़ी-सी लज्जा या संकोच आ जाए तो उनका साहित्य कालजयी हो जाए। श्रोता और पाठक उन पर फ़िदा हो जाएँ। 

पाठक साहित्य में अलंकार माँगते हैं। अलंकार भले कम हो, आटे में नमक जितना तो हो ही। साहित्य पढ़ो-सुनो तो लगे कि अलंकार का स्वाद आया। साहित्य देखो तो लगे कि कुछ अलंकार देखा। शास्त्रकारों ने आभूषणों से सुसज्जित नववधू का श्रेष्ठ अलंकार माना है लज्जा। अलंकारों से सुसज्जित साहित्यकारों में थोड़ी-सी लज्जा या संकोच आ जाए तो उनका साहित्य कालजयी हो जाए। श्रोता और पाठक उन पर फ़िदा हो जाएँ। 

साहित्य की भाषा लच्छेदार होनी चाहिए, रबड़ी-सी। दूध और शक्कर का स्वाद तो चाय में भी आता है, पर इनका जो स्वाद रबड़ी में आता है वह रबड़ी को उल्लेखनीय बनाता है। साहित्यकार को चाहिए कि वह साहित्य के दूध और रस की मिठास को इतना उबाले, इतना घोंटे कि वह लच्छेदार हो जाए। लच्छेदार होना ही साहित्य की सार्थकता है, उसका वैभव है। साहित्य की रेसिपी में बदलाव की जरूरत है। साहित्य बनाने वाले हलवाइयों को मास्टर शैफ बनने की जरूरत है। साहित्य को भोजनालय शैली में पकाने की बजाय पाँच सितारा रेस्तरां स्टाइल में बनाने का यह समय है। कम बनाओ पर लजीज़ बनाओ, ढंग से गार्निश करो, अदब से परोसो और माहौल बना कर खिलाओ। ये कोई बात हुई कि जो मर्जी हुई बना दिया, रख दिया और हुक्म दे दिया, खाना है तो खा लो, यही है। हम सब बिना इच्छा के खा रहे हैं और स्वाद के लिए तरस रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *