संविधान



ना बाँचा, ना देखा,

सिर्फ सुना है संविधान के बारे में

पटवारी साब जानते हैं खसरा-खतौनी

दरोगा साब जानते हैं गाली-गलौच

कंपाउंडर साब जानते हैं दस रुपये वाली दवा

मास्साब को मालूम है विधायक जी का पता

पुजारी जी जानते हैं भगवान को

कोई नहीं जानता संविधान के बारे में यहाँ।

पास कस्बे में है कारीगर, मिस्त्री, धोबी, नाई, टेलर

हैं बहुत से लोग कामकाजी

सूरज उगते ही लग जाते हैं

अपनी दाड़की पर

उनका क्या लेना-देना संविधान से

मुझमें हिम्मत नहीं है उनसे पूछने की

ठेके के आगे नहीं जाती उनकी दुनिया।

ट्रॉफिक सिग्नलों, देवमार्गों पर

भीख मांगते बच्चे-बूढ़े

माफिया ने जिनकी आँखें गंगाजल से पौंछ दीं,

सफ़ेदपोश बाज़ारों में धकेल दी गईं युवतियाँ

ख़दानों में दब गए मज़दूर

पाग़लखानों की जंजीरों में जकड़े लोग

काश, मैं इन्हें सुना पाता संविधान।

मैंने सुना है, जो लोग सुन-पढ़ गए संविधान

सात पुश्तें तिर गईं उनकी।

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