बापू का आधुनिक बंदर



गुजरात का नाम आए तो सबसे पहले बापू का नाम आता है, फिर फाफड़े, ढोकला, फरसाण और बापू के तीन बंदर। अब हाईटेक जमाना है, बंदर आदमी से ज़्यादा बुद्धिमान हो गए हैं। बापू इस समय होते तो तीन की बजाय एक ही बंदर पालते। हम लोग ऐसे गाना गाते, हिंदी में कहते हैं कि – बापू का बंदर, गुजराती में बोले – बापूनो वांदरो, बंगाली में कहते हैं कि – आमी तुमारो भालो बाशी। तो चलिए मैं आज आपको बापू के आधुनिक बंदर की तमाशा दिखाता हूँ।  हमारे पीछे विधानसभा भवन है। सामने दालान में मदारी डुगडुगी बजा रहा है। उसके पास बंदर थामे जमूरा खड़ा है। बंदर का मुँह लाल है, उसने सफ़ेद जैकेट पहन रखा है।

“मेहरबानो, कद्रदानो! जल्दी से आइए और घेरा बना कर खड़े हो जाइये। आज का तमाशा शुरू होने वाला है। जो एक आदमी की औलाद है, तमाशा खत्म होने के पहले अपनी जमीन नहीं छोड़ेगा। हमारे पेट पर लात मार कर कोई नहीं जाएगा।”

  • बोल जमूरे बेटा तू कितने बाप का?
  • तीन बाप का उस्ताद।

(जनता हँसती है)

– स्साला मस्करी करता है। अपने उस्ताद से मस्करी करता है। दुनिया एक बाप की तो तू तीन बाप का कैसे रे?

– उस्ताद, ग़रीब के तीन बाप होवे हैं। एक वो जो बीज डाल के चला जावे। दूजा वो जो फसल काट के बाज़ार में बेच आवे। तीजा वो जो पाल-पोस के बड़ा करे। उस्ताद, मेरे माई-बाप, ज़्यादा कह दिया हो तो खता माफ़ हो।

” जमूरा टोपी उलटी करके पैसे माँगने का उपक्रम करता है तो मदारी फिर बोलता है – “जमूरे, बिना मजूरी किए लोगों से पैसे माँगना पाप है। तू कोई नेता या दरोगा नहीं है। पहले तमाशा बता फिर बख्शीश माँगना।”

“जी उस्ताद, बंदर को डुगडुगी दो और तमाशा शुरू करो।”

मदारी बंदर की ओर डुगडुगी बढ़ाता है। बंदर दो पैरों पर खड़ा हो कर डुगडुगी पकड़ता है और बजाने लगता है। जनता जोरदार तालियाँ बजाती है। जमूरा पूछता है – “उस्ताद, बंदर का मुँह लाल क्यों है?”

“बंदर में राजसी खून दौड़ रहा है, इसलिए उसका खून लाल है।”

“उस्ताद, इस बंदर का दाम क्या है?”

“बंदर का दाम सौ करोड़ रुपया है।”

जनता विस्मित-सी बंदर को देखती है।

“उस्ताद, इतना महँगा बंदर! इसमें ऐसी क्या खासियत है?”

“जमूरे, यह विधायक बंदर है। जनता को आदमी जात पर विश्वास नहीं रहा तो उसने बंदर को विधायक चुना है।”

जमूरा कलाबाजी दिखाता है और फुसफुसाने का उपक्रम करते हुए जोर से बोलता है।

“उस्ताद, बंदर ने मुँह पर काली पट्टी लगा रखी है, ये बंदर बोलता नहीं है, इसका दाम काम करो।”

“नासमझ जमूरे, बंदर होशियार है इसलिए मुँह पर पट्टी लगा रखी है। बंदर आदमी जैसा गँवार नहीं है कि बिना काम के बोलता रहे। जमूरे सुन, बंदर का मुँह बंद है पर आँखे खुली हैं, कान खुले हैं। वह पूरा घटनाक्रम देख-सुन रहा है, समझ रहा है, बस प्रतिक्रिया नहीं दे रहा।”

” जी उस्ताद, यह बेमिसाल बंदर है।”

मदारी डुगडुगी बजाते हुए बोलता है, “ओ सरकार बनाने वालों ध्यान से सुनो। हमारे पास एक अदद विधायक बंदर है। दाम सौ करोड़ रुपया। इधर बैंक में रुपया ट्रांसफर, उधर बंदर ट्रांसफर।”

“उस्ताद, उस्ताद, बंदर का मुँह लाल से काला हो रहा है। दाम कम करने पड़ेंगे।”

“नहीं रे जमूरे, यह राजनीति का विशेषज्ञ बंदर है। अब राजसी खून वाले लोगों की सरकार बनने की उम्मीद कम हो गई है। अब दलित लोगों की सरकार बन सकती है। इसलिए इसने अपने चेहरे को दलित बना लिया है। पर दाम वही है। हाँ साहबान, पीछे से इशारा मिला। सौ करोड़…..एक, सौ करोड़……दो “

“उस्ताद, उस्ताद, ठहरो। बंदर ने मुँह की पट्टी उतार कर कानों पर चिपका ली है।”

“शाबाश! साहबानो, अब विधायक बंदर किसी की नहीं सुनेगा। मार्केट देखेगा और फैसला करेगा। अब किसी भी समय सौदा हो सकता है।”

“उस्ताद, उस्ताद, रुको, भीड़ में दो हाथ खड़े हैं। बंदर को उनसे बात करना है। अब उसने पट्टी अपनी आँखों पर बाँध ली है।”

“जमूरे, बोलीदारों को बुला कर लाओ। अपना बंदर निष्पक्ष है, कानून की तरह अंधा बन कर न्याय करना चाहता है। बोलीदारों आओ, बंदर के कान में रकम बोलो। जिसका ऑफर ऊँचा, बंदर विधायक उसका। कद्रदानो, आखिरी मौका है ये। एक बार बंदर बिक गया सो बिक गया।”

राजनेतानुमा दो बोलीदार आते हैं। एक बंदर के दाँये खड़ा है, दूसरा उसके बाएँ। दोनों बंदर के कान में बोलते हैं। बंदर बायीं तरफ वाले का हाथ खड़ा कर देता है।

डुगडुगी जोर-जोर से बजती है। जनता पूछती है, “बंदर कितने में बिका?”

“कद्रदानो, ये सौदा गोपनीय है। बस, बंदर बिक गया है।”

“अब मदारी और जमूरे के पापी पेट का सवाल है। जा जमूरे, जनता को सलाम कर। अपनी टोपी उलटी कर और बख्शीश माँग। साहबानो, शो खत्म। एक बाप की औलाद हमारे पेट पर लात नहीं मारना। कुछ भी देना, पाँच रुपया, दो रुपया, एक रुपया……”

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