दाल-बाटी और चूरमा



दिल्ली में बहुत धुंआ भर जाता है, और आकाश में धुंध। किसी को साफ़-साफ़ नहीं दिखता। राजनीति अंधी हो गई है और कूटनीति बहरी। अर्थनीति, व्यर्थनीति साबित हो रही है। नोटबंदी, कालेधन की नसबंदी नहीं कर सकी है तथा जी एस टी ने कारोबारियों को और छोटा बना दिया है। दिल्ली के मारे सारा देश बीमार हो रहा है। अब नेतागण खिचड़ी पका रहे हैं और देश को परोस रहे हैं, देश कुछ तो ठीक हो।

जब से खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन बनाने का विचार खदबदाने लगा है, मेरी राष्टीय भावना मुझे झकझोरने लगी है। मेरी आत्मा कहने लगी है – हे वीर उठो और सरकार को बताओ कि इस देश की विकराल भूख मिटने का रामबाण नुस्खा है दाल-बाटी और चूरमा। कहाँ दाल-बाटी और कहाँ खिचड़ी। कहाँ राजा भोज, और कहाँ गंगू तेली।

हो सकता है, आपने अब तक दाल-बाटी नहीं खाई हो। कभी-कभी भाग्योदय होने में समय लगता है। आप खिचड़ी खाते रहे और बार-बार डॉक्टरों के दरबार में जाते रहे। एक बार तो सोचा होता, देश में बहुत खिचड़ी पक गयी है। रोटी, कपड़ा और मकान के नाम पर खिचड़ी पकी, गरीबी हटाने के नाम पर खिचड़ी पकी, फिर सम्पूर्ण क्रांति की खिचड़ी पकी। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए खिचड़ी पकी। जैसे ही खिचड़ी पकी, राजनेता खा गए और पचा गए। जनता तालियाँ बजाती रहीं, देश वहीं रहा। जो चारा पचा सकता है, उसके लिए खिचड़ी पचाना कितना आसान है। काश, आपने दाल-बाटी पकाई होती तो राजनेताओं के लिए उसे गुपचुप पचाना मुश्किल होता।

मैं दाल-बाटी को राष्ट्रीय भोजन बनाने के पक्ष में हूँ। जो लोग संकीर्ण हैं वे दाल-बाटी को राजस्थानी भोजन मानते हैं। हो सकता है दाल-बाटी का विकास राजस्थान में हुआ हो, पर इसका उद्भव तो आदिकाल में हुआ है। आदमी ने जब पहली बार आटा बनाया, उसे गूंथा, गूंथ कर गोले बनाये और गोबर के कंडों पर सेंक लिए, धीमी-धीमी आँच पर। सब लोगों ने खाया-पीया और तान कर सो गए। आदिम काल से आज तक आदमी का यही चरित्र है, जब भी मौका मिले, खाओ-पीयो और तान कर सो जाओ। इस प्रवृत्ति को यदि राजस्थानी कह कर सीमित कर दिया तो यह शेष भारत के साथ अन्याय होगा। 

मैं दाल-बाटी के उद्भव और विकास की बात एक गोष्ठी में रख रहा था तो कुछ लोग जोश में आ गए। कहने लगे दाल-बाटी हमारी आन-बान-शान है। इसे राष्ट्रीय भोजन का श्रेय मिलना ही चाहिए। मारवाड़ी देश के हर कोने में हैं, और जहाँ मारवाड़ी हैं, वहाँ दाल-बाटी है, चूरमा है, गट्टा-कड़ी है। दाल-बाटी के स्वाद की तरह यह भाव मुझमें स्थायी हो गया। विदेशों में कंडों के अभाव में और दाल-बाटी की व्यापक लोकप्रियता के कारण एन आर आई लोगों ने बाटी को ओवन में पकाना शुरू किया, और यह प्रथा भारत में भी तेजी से फैल गई। अकेले न्यूयॉर्क में ही मेरे सौ से ज़्यादा राजस्थानी दोस्त हैं। अधिकांश हीरे के कारोबारी हैं। रविवार-रविवार छक कर दाल-बाटी खाते हैं, खिलाते हैं और चरम सुख पाते हैं। यह सुख ही उनके नेत्रों को इतना दिव्य बनाता है कि वे चमकदार पत्थर और हीरे में अंतर कर पाते हैं। यह स्थिति एंटवर्प में है, लंदन में है और स्विटज़रलैंड में भी है। यही स्थिति विश्व व्यापी है।

किसी मशहूर राजस्थानी कवि ने दाल-बाटी खाकर ही कहा होगा –  दाल-बाटी और चूरमा, जो खाए वो सूरमा। इस सुप्रसिद्ध कविता में यह तथ्य छुपा है कि सूरमा बनने के लिए दाल-बाटी-चूरमा खाने का कितना महत्व है। राजस्थानी लोग इसलिए सूरमाओं के पर्याय माने जाते हैं।

खिचड़ी में राष्ट्रीय व्यंजन बनने का इतना दम नहीं है। और तो और, जिस उदर में खिचड़ी जाती है, वह उदर थोड़ी ही देर में फिर डिब्बे टटोलने लगता है। ‘भूख’ असमय जागृत हो जाती है, और बेचारे भारतीयों पर ‘भूखे’ होने का आरोप सच लगने लगता है। बाटी का अपना बलिष्ठ व ठोस रौबदार रूप है। वह उदर में आसन ग्रहण करती है तो एक वक्त के पूरे भोजन का अपना कर्तव्य निभाती है। टिकाऊ होने के कारण उत्सवों में देसी आयोजकों की यह पहली पसंद होती है। रसोई से लेकर लोकजीवन में दाल-बाटी ऐसी रची-बसी है कि सड़क किनारे ढाबों में कुछ दाल-बाटी स्पेशियल हैं, तो कुछ मास्टर शेफ अपनी दाल-बाटी की थाली पाँच सितारा होटलों के विशेष आयोजनों में परोसते हैं। चूरमे के लडडू का बोनस तो फिर चाहिए ही। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं दाल-बाटी-चूरमे से सिर्फ भूख ही तृप्त नहीं होती, आत्मा भी तृप्त हो जाती है। पितर भी गद्गद् हो जाते हैं।

मुझे लगा हम सब दाल-बाटी प्रेमियों का दाल-बाटी को वैश्विक भोजन का सम्मान दिलाना नैतिक कर्तव्य बनता है। इसलिए मैं राजधानी में अपने एक मित्र से मिला। वे सरकारी थिंक-टैंक में शामिल हैं। वे बड़े-बड़े चिंतकों से छोटे-छोटे मामलों पर गोपनीय राय लेते हैं। मैंने उन्हें राय दी – “दाल-बाटी को थोड़ा ऊपर उठाओ, दालबाटी को राष्ट्रीय व्यंजन बनवाओ।” वे गंभीर हो गए। वे बोले – ‘तुम मित्र हो, इसलिए अंदर की बात बताता हूँ। राजनेता और बड़े अफसर जो भोग लेते-लगाते हैं, वह किसी को दिखना नहीं चाहिए। दाल-बाटी पानी माँगती है, पेट में जा कर फूल जाती है। भक्षक की तोंद फूल जाती है। सहयोगियों और विपक्षियों को खाने वाले का पेट दिखने लगता है। इसलिए हम सलाहकार दाल-बाटी को सपोर्ट नहीं कर सकते।’

वे कहने लगे – ‘राज़ की बात सुनो। सत्ता की भूख चिर होती है, कभी तृप्त नहीं होती। राजनेता और बड़े अफसर खाते हैं तो कभी डकार नहीं लेते। दाल-बाटी खाने के बाद डकार आती है, दाल-बाटी दो-चार घंटे पेट में बैठ जाती है। इतनी देर में तो दस विपक्षी दल वाले और बीस चैनल वाले खोज-ख़बर लेने आ जाएँ। खाया-पीया तो खिचड़ी जैसा होना चाहिए। इधर खाया, उधर हजम। डिजिटली स्विस बैंक या ऑफ़-शोर खाते में पहुँच जाये और रफा-दफा हो जाए।’

मैं भौंचक्का अंदर की बात सुन रहा था। वे बोले ‘दाल-बाटी को राष्ट्रीय व्यंजन बनाने में छिछली राजनीति हो सकती है। खिचड़ी हो या दाल-बाटी, दोनों चीजें ठहरीं शाकाहारी। विपक्षियों को शाकाहारी शब्द से सांप्रदायिक होने की गंध आ सकती है। उन्हें दाल और खिचड़ी का रंग भी कुछ-कुछ सांप्रदायिक लग सकता है। सरकार देश चलाने के लिए है, राष्ट्रीय व्यंजन बनाने के लिए नहीं। हमें नहीं घोषित करना कोई राष्ट्रीय व्यंजन।’

चलो, जिसकी जो मर्जी हो वह खाए। राजस्थानी जीमण की शान तो कायम है और रहेगी। जिसके घुटनों में जान बची है, वे आज भी आलकी-पालकी की राजयोग मुद्रा में बैठ कर दाल-बाटी का आनंद उठाते हैं। हाँ, जिन जजमानों के लिए दाल-बाटी खाने के बाद उठ कर खड़ा होना मुश्किल है, उनको उठाने के लिए अब स्वयंसेवक नहीं बचे हैं। जजमान ज़्यादा हैं, स्वयंसेवक कम। इसलिए दाल-बाटी का लुत्फ़ आप टेबल-कुर्सी पर बैठ कर उठा सकते हैं।

पिछली सदी में घुमन्तु कबीले होते थे। ऊँटों पर अपने घर-बार लाद कर, गाँव-गाँव जाते थे, डेरा डालते थे और लोहा पीट-पीट कर औजार बनाते थे। उसी आग पर वे दाल-बाटी पका लेते थे। इस तरह राजस्थान से चली दाल-बाटी सारे भारत में फैल गयी। वह सदी गई, और वे बातें गयीं। अब घुमन्तु लोग प्रोफेशनल कहे जाते हैं। ऊँटों की बजाय हवाईजहाज से जाते हैं। देश में कम विदेशों में ज़्यादा जाते हैं।  वहाँ पहुँच कर अपना लैपटॉप निकालते हैं और दिमाग़ की दाल-बाटी बनाना शुरू कर देते हैं। 

दाल-बाटी गरीबी और अमीरी से बहुत ऊपर है। अमीर मुँह बंद कर दाल-बाटी धीरे-धीरे चबाते हैं तो गरीब उतने ही शौक से अपनी उँगलियाँ चाटते हैं। बदलता है तो बस थाली का रंग-रूप। दाल-बाटी के मूल, आटा और दाल तो सबके लिए वही हैं, इसी धरती के स्नेह से पनपे। दाल-बाटी की बात हो और घी का नाम नहीं आए, तो सारे चमचे नाराज़ हो जाएंगे। जैसे बिना चमचों के नेताजी की आभा मंद लगती है, बिना घी के दाल-बाटी के सुस्वाद का आनंद नहीं आता। चमचे नेताजी के हृदय में बसते हैं और बाहर भी, ऐसा ही आत्मिक संबंध दाल-बाटी और घी का है। दाल-बाटी के राष्ट्रीय व्यंजन नहीं बन पाने का दुःख तो है, पर क्या करें। बस, दाल का तीखापन थोड़ा कम हो जाए, तो दाल-बाटी खाने के बाद भी अंग्रेज़ों की त्वचा गोरी ही रहेगी, लाल नहीं होगी। जयपुर के दाल-बाटी घरानों में अंग्रेज़ों को दाल-बाटी खाते देखना इतना रोमांचकारी है कि हमारे न्यूज़ चैनल पूरे दिन ब्रेकिंग न्यूज़ चला सकते हैं।

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