इंडियन पपेट शो



(विधानसभा थियेटर खचाखच भरा हुआ था। महामहिम राज्यपाल, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और मुख्यमंत्री प्रथम पंक्ति में विराजमान थे। यह विधानसभा सत्र नहीं था पर होहल्ला वैसा ही था। संगीत की फुहारें उठीं और दर्शक चुप होने लगे। स्पीकर महोदय ने बाहरी पर्दा खींचा तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। पार्श्व पर्दे पर हिंदी में लिखा था – ‘इंडियन पपेट शो’ उसके नीचे लिखा था लोकतंत्र कला मंडल द्वारा प्रस्तुत।

लोकतंत्र कला मंडल के निदेशक ने माइक सम्हाला। हिंदी में इन्हें कठपुतली मास्टर कहते थे पर अंग्रेज़ी पसंद लोग उन्हें हाईकमान के नाम से जानते थे। उनके पास बत्तीस कठपुतलियों की कमान थी। कठपुतलियाँ नचाने में उनका कोई सानी नहीं था। जैसा कार्यक्रम होता वे वैसे डायलॉग बोलते तथा कठपुतलियाँ नचा देते। वे कठपुतलियों के मालिक नहीं थे, मालिक कभी मंच पर नहीं आते थे, मालिक गल्ले पर बैठते थे, टिकट बेचते थे और लोकतंत्र मैनेज करते थे।)

कठपुतली मास्टर – साहबानो, आप सबका स्वागत। लोकसभा, राज्यसभा और कई विधानसभा प्रेक्षागृहों में हमने यह शो मंचित किया है। इसमें नचनिया, मदारी और नागिन डांस, पति-पत्नी की नोकझोंक और बहुत कुछ है। इंडियन पपेट शो का आनंद लीजिए।

(नेपथ्य में गाना बजता है…. अरे…. रे रे रे रे रे रे, तीन पहरेदार कठपुतलियाँ नंगी तलवार लिए ऊपर से उतरती हैं और पिछले पर्दे से सट कर खड़ी हो जाती हैं, चौकन्नी निगाहें। एक नचनिया कठपुतली आदाब और नृत्य करते हुए मंच पर उतरती है।)

नेपथ्य से – अनारकली सबको नमस्कार करो। ये नमस्कार, ये नमस्कार, ये नमस्कार। जज साहब, मी लॉर्ड,  कठपुतलियों की अग्रिम जमानत मंजूर हो।

(दर्शकों की समवेत हँसी, उछलकूद और विभिन्न मुद्राओं में नमस्ते करतीं अन्य कठपुतलियाँ मंच पर उतरती हैं, नेपथ्य से कठपुतली मास्टर उनका परिचय देते रहते हैं।)

पहली – ये घोड़े पर बैठी एमेले कठपुतली देखो। ये आरक्षित एमेले है, कागज़ की लुगदी की बनी है। इसकी पोशाक ग्रामीण है, और नाम है बबली। यह बिना बात के रो सकती है और हर किसी को धो सकती है। इसको अंग्रेजी में सिर्फ बी लिखना आता है पर बहुत आनाकानी और मोलभाव के बाद बी लिखती है। यदि इसको सारे अल्फाबेट्स आते तो छब्बीस राज्य अपने नाम लिखवा लेती।

अब दूसरे एमेले कठपुतले रमेश सिंह से मिलिए, यह बाइक पर सवार है, एंग्री यंग मैन है,प्लास्टिक का बना है, हमारा प्रवक्ता है। जो बोलता है निचोड़ कर बोलता है। इसे सबसे ज़्यादा शालीन गालियाँ आती हैं। यह तीसरा कठपुतला जो कार में सवार है, राजसी है, नाम है राजा। यह मुख्यमंत्री पद का चेहरा है, काठ का बना है। चकाचक कुर्ता-पाजामा-जैकेट पहने है। यह अंदर से घाघ, दबंग और ऊपर से माधो है। चौथा कठपुतला टीवी एंकर है। इसके आगे-पीछे, ऊपर-नीचे माइक लगे हैं। यह फुसफुसाहट तक को पकड़ सकता है, आप जो बोलें उसका तत्काल अनर्थ कर सकता है। इसके साथ इसका कैमरा मैन है। शेष एमेले कठपुतले-पुतलियाँ हाथ खड़े करने और हाय-हाय चिल्लाने में निपुण हैं, लोकतंत्र में सच्चे जनप्रतिनिधियों का इतना ही रोल है।  

तालियाँ बजाइए साहबानो। कलाकारो, अपने रसिकों का झुक कर सम्मान करो। इंडियन पपेट शो शुरू।

(सभी कठपुतलियाँ उछलती-कूदती, नाचने लगती हैं।)

एंकर (राजा से तीखे तेवर में) :  आप विधायकों को कठपुतली बनाते हैं या कठपुतलियों को विधायक।

राजा : एक ही बात है। आप कैसे भी घुमा-फिरा कर पूछो। विधायक, विधायक है।

एंकर : आप प्रश्न को टाल रहे हैं। आप कठपुतलियों को विधायक नहीं बना सकते।

राजा : का टाल रहे जी! इन्हें बंधुआ मजदूर कहो, गुलाम कहो, घरेलू नौकर कहो। प्रेस की जो मर्जी हो कहो। इन्होंने संविधान की सौगंध ले कर विधायक होने की शपथ ली है। इन्होंने इनकी आत्मा हमें दी, हमने इन्हें टिकट दिया। अब हमारी आवाज़ इनकी आत्मा की आवाज़ है। फालतू बात करते हो।

एंकर : कल शक्ति प्रदर्शन में कितनी कठपुतलियाँ आपका साथ देगी?

राजा (ज़ोर देते हुए) : विधायक कहो, कठपुतली नहीं। पपेट शो है तो क्या हुआ, लोकतंत्र की अपनी मर्यादा है।

एंकर : कितना विश्वास है आपको इन पर?

राजा : देखिए, सब विधायक हमारे साथ हैं। ये क्या, इनके बीबी-बच्चे भी हमारे साथ हैं, गुप्त रिज़ॉर्ट में हमारी जीत का जश्न मना रहे हैं। 

एंकर : साफ़-साफ़ कहिए, तो वे बंधक हैं?

राजा : विपक्षी पार्टियाँ विधायकों को बंधक रखती होंगी, ये सब हमारे बड़े परिवार का हिस्सा हैं।

एंकर : कठपुतलियों को टोपी और कपड़े बदलने में क्या वक्त लगता है? कभी भी क्रॉस वोटिंग हो सकती है।

राजा : ऐसा नहीं है, क्रॉस वोटिंग कैसे हो सकती है। इनके हाथ, पैर, उँगलियाँ, कमर, सिर सब डोर से बंधे हैं। हाईकमान जैसी डोर खींचते हैं, ये वैसा एक्शन करते हैं। ये समर्पित विधायक हैं।

बबली (नारा लगाती है) : हमारा सीएम कैसा हो? शेष कठपुतलियाँ समवेत – राजा भैया जैसा हो।

एंकर : ख़ुशी की बात है, ये बोल रहे हैं! ये कैसे बोलते हैं?

राजा : ये बोलते नहीं हैं, होंठ हिलाते हैं। पर्दे के ऊपर से हाईकमान बोलते हैं और इनके होंठों की डोर खींचते हैं। लोगों को दिखता है कठपुतलियाँ बोल रही हैं।

एंकर : आपको नहीं लगता कि लोकतंत्र के प्रतिनिधि आदमी होने चाहिए, कठपुतलियाँ नहीं! भले ही यह शो हो। कठपुतलियों ने राजनीति को व्यवसाय बना दिया है।

राजा : आदमी पलट सकता है, काठ के पुतले नहीं। इनकी निष्ठा बेजोड़ है। हमारे शरीर में हरकत हाईकमान द्वारा डोर खींचने से होती है, अन्यथा हम मुर्दे हैं। हम सेवा की राजनीति करते हैं, विचारधारा की सेवा। हम सब विचारधारा की डोर से जुड़े हैं।

एंकर (हँसते हुए) : कठपुतलियाँ और विचारधारा, हा, हा, हा, हा।

प्रवक्ता : ये विचारधारा ही है जो कठपुतलियों को विधायक बनाती है, योग्य बनाती है, लोकतंत्र का रक्षक बनाती है।

एंकर : कठपुतलियों का खेल तो लोककला मानी जाती है, आप इसे लोकतंत्र कैसे कह सकती हैं?

बबली : हम कह सकते हैं, हम कहेंगे। यह हमारा शो है। लोकतंत्र का पपेट शो है।

एंकर : आप लोगों ने एक जैसी वर्दी क्यों पहन रखी है, वर्दी से जनता डरती है।

प्रवक्ता : वर्दी हमारी एकता की निशानी है। पुलिस क्या डराने के लिए वर्दी पहनती हैं? अब लाल बत्ती तो रही नहीं, दूर से देख कर सबको मालूम हो जाए कि ये सत्तारूढ़ विधायक हैं इसलिए हाईकमान ने ये वर्दियाँ बनवाई हैं।

एंकर : आप हर बात में हाईकमान-हाईकमान करते हैं। आपको तो जनता के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए।

बबली (ठुनक कर) : सबै एमेले हाईकमान के। पैसा हाईकमान खर्चे, भेंट-बँटाई हाईकमान करावे तो दिन में एक सौ आठ बार हाईकमान नाम जीभ पर आवे। हाईकमान साथ ना दे तो एमेले का भया, सड़क-छाप नेता!

एंकर: आपका हाईकमान कौन है, कोई संघ, संगठन, चाचा-भतीजा, भुआ-दीदी, पप्पू, चरवाहा या कोई और? ये लोग इतना पैसा लाते कहाँ से हैं?

राजा : हाईकमान की लीला हाईकमान ही जाने। वे हमें जो जनादेश देते हैं, हम उसका पालन करते हैं। 

बबली : रही पैसे की बात तो, लोग भारी-भरी थैलियाँ ले कर देने के लिए खड़े हैं। जो ख़ुशी से देते हैं हाईकमान रख लेते हैं, जो ख़ुशी से नहीं देते उन्हें हम समझा देते हैं।

एंकर (जोर से) : जनता जानना चाहती है, कौन देते हैं पैसा – उद्योगपति, मल्टी नेशनल कम्पनियाँ, विदेशी पूंजीपति?

राजा : एंकर बाबू,  जो आपको देते हैं वे हमें भी देते हैं, वे ही विपक्षियों को देते हैं। जितना बड़ा माथा, उतना बड़ा तिलक। राजनीति में सौजन्य से सब खुश रहते हैं, सर्वे भवन्तु सुखिनः। चलो इंटरव्यू ख़तम।

(सब कठपुतलियाँ उछलती-कूदती, आदाब और नृत्य करते हुए मंच से ऊपर उठती हैं।)

(राजा फुसफुसाते हुए) : एंकर बाबू, अच्छी टीआरपी मिलेगी। इंतज़ाम है, दो पैग लगा कर जाना।

(पर्दा गिरता है, दर्शक हाल में खड़े हो कर तालियाँ बजाते हैं, वे और क्या कर सकते हैं!)

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