www.dharmtoronto.com किताबों पर चर्चा प्रवासी कवि की कविताएँ – प्रकृति और जीवन के सहकार के लिए

प्रवासी कवि की कविताएँ – प्रकृति और जीवन के सहकार के लिए



  • प्रो. बी.एल. आच्छा

धर्मपाल महेन्द्र जैन से मेरा साक्षात्कार उनके व्यंग्यों की मार से ही हुआ है। इतने चुभते-चुभाते काँटों के बीच ‘इस समय तक’ का काव्य राग सर्वथा अलहदा है। ये कविताएँ जितनी राग वत्सल हैं, उतनी ही अपने आँचलिक भूगोल में खिलती हुईं। मगर रागात्मक काव्य चेतना का प्रवाह पारिवारिकता में जितना तरल है, प्रकृति के अनेकवर्णी रंगों में जितना निखरा है, प्रकृति और मानवीय रिश्तों में जितना सहचर बनाता है, उतना ही जनजीवन के यथार्थ और बदलाव भरे सपनों की सकर्मक आस्था का भी है। इन कविताओं में समुद्र सोखती किरणों की वह उष्णता है जो भाप की तरह आकाशी बन जाती है, पर प्रकृति के बीच मानवीय रिश्तों में भावतरल होकर धरती का परस करती है। यह तरलता प्रकृति के रंगों में, रिश्तों के परिवेशों में, कविताओं के शब्द-राग में, अपने आँचलिक भूगोल में, आम आदमी के गहराते दर्दों में इतनी हिलमिल गयी है कि बार-बार यथार्थ की नुकीली चट्टानों में बहना और मानवीय आस्थाओं को उगाना चाहती है। प्रकाशन के पहले संस्करण वर्ष (2019) में ही इसके दूसरे संस्करण छपने एवं शांति-गया स्मृति कविता पुरस्कार के लिए चुने जाने की ख़बर से यह किताब चर्चा में रही है।

इन कविताओं में न तो प्रकृति का आभिजात्य है, न बदलाव के लिए तनी मुट्ठियाँ। प्रकृति और मानवीय रिश्तों में जितना सहचर है, उतना ही प्रकृति और जीवन से मिले दाय को समर्पण की तरह लौटाने की आस्था। बिल्कुल वैसी ही, जैसे नदी समुद्र को अपना सारा स्वत्व, सारा जीवन संघर्ष, चट्टानों से टकराने और राह बनाने की जीवट, धरती किनारों का मंजर, वानस्पतिक स्पर्श, जीवन लहरियों की अठखेलियाँ समर्पित कर देती है। उदात्त भावों की यह सृष्टि विविध परिवेशों, पड़ावों के साथ इन कविताओं में रची बसी है।

इस संग्रह में कविताएँ माँ से शुरू होकर विविध सोपानों से गुजरती हुई अन्ततः आदमी की व्यापक परिधि में काव्य चेतना का विस्तार करती हैं। भावनात्मक स्पर्श में भीगी हुई शब्दावली, स्मृतियों, लोरियों और वात्सल्यमयी क्रियात्मकता में उगती माँ केवल दृश्यमान नहीं है, बल्कि उसके प्यार से अपने भीतर उगती वह आकांक्षा भी जो संतान में कातर आवेश के बजाय आग बनना चाहती है। ये पिघले हुए शब्द जब दूसरे रूप में प्यार की लय को साधते हैं, तो कवि की अनुभूति में वह चाँदनी रात में शब्द का महाकाव्य हो जाता है। चाँदनी रात में यह संस्थागत सी रूढ़ पत्नी है, पर कवि में उसी प्रणय भावना से ऐसे रसायन जुटाये हैं जो सहचरत्व की प्यास के मानिन्द बहाव लिए हुए हैं। विश्व के सारे पौरुष भाव का समर्पण जो आस्था, संवेदना और लगाव की प्रतिरूप पत्नी में रूपांतरित हो जाता है। इस पत्नीत्व के साथ प्रणय का संचार जब प्रकृति में मूर्त होता है तो अपने नैसर्गिक रूप की चाहत के साथ कल मिलो तो होंठ सूखे हों/ अ-रंगे, अ-कृत्रिम/ लिपस्टिकी अनुभूतियाँ/ कुदरती नहीं लगतीं। इस नैसर्गिक रूप को कवि अपनी बन्द आँखों में उतरते देखता है तो प्रतीप अलंकार खुद ही विलक्षणता रच जाता है – ‘इन्द्रधनुष को तुममें बदलते हुए उपमान कुछ नयेपन को संजोते हैं, पत्नी में प्रेमिका सा रंग छिटकाते हुए – विचार की तरह आती हो तुम सहज/ और व्याकरण बनने लगती हो धीरे धीरे। इन रंगों में भावसहजता है, चटक रंगों का लेप भी, थिरकती लय और सम्मूर्त होती चित्र-भाषा भी इस प्रणय को मुकाम पर पहुँचाती है पत्नी रूप में- पढ़नी नहीं आती मुझे वह भाषा/ जिसमें तुम लिखी गयी हो/ यह जानते हुए कि सृष्टि की श्रेष्ठ भाषा हो तुम।

अगले सोपान पर ‘बेटी’। संवेदन के वे ही भाव-रसायन पारिवारिक इकाई में संस्थागत जड़ताओं को पिघलाते हुए नये स्वरूप को गढ़ते जाते हैं- दर्पण से युद्ध करती चिड़िया जैसी। भोली है मेरी बेटी।इन्हीं वत्सल रागों के बीच रेखांकन बनाती और रोटियाँ बनाती बेटी सवाल खड़े करते हुए बड़े होने का एहसास कराती जाती है। खासियत यह है कि ये सारे चित्र सारे भाव, सारे राग प्रकृति के सहकार के साथ अपनी क्रियापरकता में उतर कर आये हैं। जीवन भी इनमें झाँकता है, क्रिया से नाट्य मुद्राएँ सजीव हो जाती हैं और संवेदन की तरलता से कविता की लय सध जाती है।

पारिवारिक परिधि से निकलकर कवि जनजीवन के यथार्थ और अनुभवों के संसार में आता है – वे अक्षर जो कल रोपे मैंने / पनपेंगे वृक्षों में। पूरी प्रकृति, उसकी दृश्यावली, उसके बिम्ब, प्रकृति के बदलते रूप कवि के वैचारिक संवेदन में तब्दील होते जाते हैं- बहुत कठिन है/ नदी को कागज पर बाँधना/ शब्द हो जाते हैं दुर्निवार/ इतने कि लोक मोह से परिवेष्टित मेरी देह से/ निकल जाते हैं बाहर/ भूल जाता हूँ मैं अपना लोक, अपनी देह/ और कविता हो जाता हूँ। कविता और जीवन की लय प्रकृति और जीवन के दर्दों की लय, व्यक्ति में संक्रान्त होती सामाजिकता की लय आम आदमी की जिन्दगी तक जाती है। भाषा अपने आभिजात्य, भावतरलता और प्रतीकों-उपमानों की दुनिया से निकलकर निहत्थे आदमी के हथियार की भाषा तक ले जाती है, तटस्थताओं को चीर कर। ‘शब्द’ की सत्ता के तेवर बदल जाते हैं, उसकी सार्थकता के प्रतिमान बदल जाते हैं, भंगिमाएँ बदल जाती हैं।

पर ‘मेरा गाँव’ में कवि इस व्यापक फलक और वैचारिक स्पन्दन के बावजूद अपने आँचलिक भूगोल की ओर लौटता है। लोक जीवन के आदिम रंगों में जहाँ आदिवासी भीलों की शोषित दुनिया, अकाल की भयावहता के साथ प्रकृति के वानस्पतिक, जैविक रंग भी पूरा आदिवासी जीवन बिम्ब रचते हैं। धधकी हुई है धूप/ लगता है सूरज फलालेन से रगड़ खाकर/ भभक गया है/ धूप उस ओटले पर भी है/ जहाँ बैठा है एक दिगम्बर बच्चा/ मिट्टी के रंग-सा/ हाँ, काला बच्चा और गोरी धूप/ दोनों खेल रहे हैं उस ओटले पर। अब झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे या भील की व्यथा हो या उसका मैगनीज़ के रंग सा उम्रहीन चेहरा, या कवेलू की ऊबड़ खाबड़ छत या कि न सीख पाई कंक्रीट में घोसले बनाने वाली चिड़िया- ये सभी कविताएँ कवि में उस भाषा को उगाते हैं जो बदलाव के लिए संकल्प रचती हैं- “बहुत कुछ ऐसा है आस-पास अब आँखों को जीभ चाहिए धारदार/ और जीभ को मजबूत हाथ मेरे दोस्त।”

यों तो इस संकलन में प्रकृति हर कहीं छिटकी हुई है पर प्रकृति खंड की कविताओं में जनजीवन बिखरा–निखरा है। भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानों में केवल आकृतियाँ ही नहीं नंगधड़ंग बच्चे और नाविक भी नर्मदा का परिदृश्य बन जाते हैं। ‘समुद्र’ में मानव बिम्ब आर्तनाद करता है – वह  खाँसता रहा शतायु बूढ़े सा/ मैंने नहीं देखी शांत/ कोई सतह समुद्र की। धूप हो या फुहारें, गोधूलि हो या धुँआ, नई पत्तियाँ हों या फलालेनी देहवाली बिल्ली, इन सब में जीवन के असल रूप थिरकते हैं।

काव्य यात्रा का निरंतर नये सोपान गढ़ता पड़ाव है- ‘सत्ता’। और यहाँ जीवन और वैश्विक घटनाचक्र इतिहास के निर्मित चक्रों से गुजरते हुए गहरे सवालों से टकराता है, व्यथाओं से आन्दोलित होता है। महाभारत से लेकर हिरोशिमा, वियतनाम और सीरिया तक राजवंशों से प्रजातंत्र तक, आदिम यातनाओं से संविधान तक वह सत्ता की निरंकुशताओं में आम आदमी की नियति को तलाशता है – ‘सचेत हो गये गडरिए/ बदल लीं टोपियाँ, खेत और पगडंडियाँ/ नहीं बदलीं भेड़ें, सिर झुका जुड़ती रहीं/ उस समय से इस समय तक। इसलिए उसे उस वर्णमाला की दरकार है जो सिखा सके- काश खुद के लिए लड़ना सिखाती/ कोई वर्णमाला/ अ – अधिकार का/ आ – आग का/ इ – इंसाफ का/ ई – ईंट का/ ऐसी पाठशाला नहीं मिली उसे। यह प्रयोगी शिल्प नहीं, जनजीवन की दुश्वारियों और सत्तानशीनों के आदर्शविहीन चेहरों का खड़खड़ाता विद्रोही स्वर है। ‘दाड़की’ पर जाता आम कामकाजी, तपेदिक में खाँसते बूढ़े, खदानों के मजदूर, स – सत्ता का श शक्ति का ह हक का नही पढ़ पाए; जो सारे सोच को बदल सकते थे। ‘दो भागों में देश’ इसी अमीरी-गरीबी की गहरी फाँक को जनजीवन के दर्दीले स्वर से रचती है। ग़ज़लनुमा रूप में कुछ शेर बहुत असरदार हैं – घर को कब्र बनाने का ख्याल उनका था। क़यामत लाओ मुर्दों की आवाज़ निकल आए। ‘नहीं बदली दृष्टि तो’ कविता में अमेरिका – उत्तरी कोरिया का परिदृश्य युद्ध की त्रासदी और भयावहता में विनाशलीला रचती है। अन्तिम सोपान पर वह आदमी और इस आदमी के कई रंग, कई व्यथाएँ, रेशा-रेशा उलझने, अन्तर्मन से लेकर आदिम जरूरतों तक अन्तःसंसार से लेकर सागर में युद्धपोतों की तनातनी तक, मामूली जरूरतों से लेकर मॉल की आधुनिकता में पसरी सामाजिकता तक। कहीं फलसफे हैं, कहीं रुदन में अन्तर्मन के प्रक्षालन से जगी आस्था, कहीं व्यंग्य की सधी मार, कहीं भीड़ में अकेलेपन का मनोविज्ञान, कहीं वास्तविकताओं के अहसास, कहीं सपनों में उगता आस्था का मनोबल। ‘रोना यातना नहीं है’ कि यह आस्था आदमी के भीतर की हलचल है – मन के फफोलों को बार-बार सहलाना ही यातना है/ फफोलों के उपभोग से जन्मी/ चुप न करो/ चुप होना ही यातना है/ इसलिए रो लेने दो मुझे। पर यही आस्था आदमी को, उस आदमी को इस कोने पर भी प्रश्नांकित करती है- आदमी आधार कार्ड या सोशल सिक्युरिटी नंबर के बिना/ कुछ भी नहीं/ अंकों और अक्षरों के समीकरण/ आदमी बन गए हैं। डिजिटल होती इंसानी बिरादरी में आदमी ऊपरी सतह पर है लेकिन इन कविताओं में अन्तःस्थल का वह आदमी साबुत है – अच्छा नहीं लगता/ अपने में बिखरना/ अच्छा लगता है/ समय से जुड़कर सपनों में रहना/ इसलिए देखता हूँ मैं/ आशा और विश्वास के सपने। इसीलिए इन कविताओं में तार-तार रेशों में उलझे रिश्तों के गणित भी हैं, आदमी के भीतर ही उससे रूठा आदमी भी है, मीठी जुबाँ में फीकी हँसी का प्यार भी है पर सारी उलझनों के बाद भी उसकी आस्था नदी की तरह सार्थक हो जाना चाहती है- “धार-धार रो लेने  दो मुझे/ ताकि आँखें प्रपात बन जाएँ और चेहरा नदी/ फिर देखना पत्थर मन टूटेगा, बहेगा/ पत्थर की किरचियाँ होंगी/ रेत-रेत होता रहेगा पत्थर मन/ बहता रहेगा/ सच मेरे रोने से/ मैं नदी सा सार्थक हो जाऊँगा/ इसलिए रोने दो मुझे। और इस संकलित आस्था को वह प्रकृति में देखता है- कुछ समझदार पौधे/ जो बनना चाहते हैं पेड़/ थिरक लेते हैं हर धुन में/ जी लेते हैं हर मौसम में।

कई सारे परिप्रेक्ष्य हैं आदमी और जिन्दगी के। चाहे वह भोपाल की गैस त्रासदी का हाहाकार हो, इबादत-प्रार्थना के स्थलों पर शैतानियत के हादसे हों, बाजार के चेहरे में आदमी के सामाजिक प्राणी होने की बहसें हो, मन के भीतर का लावारिस-से आदमी की शोकांतिका हो या कि जंगी जहाजों में शस्त्रों की भयावह दौड़ में उलझी अन्तरराष्ट्रीयता। पर माँ से शुरू हुई स्नेहिल आस्था आदमी के भीतर बाहर परिक्रमा करती हुई, उलझे-सुलझे रिश्ते को पहचानती हुई, प्रकृति की आस्थापरकता से लिपटती हुई अन्ततः एक ही संकल्प में बहना चाहती है- पागल हाथी-सा मदोन्मत्त/ या अग्नि-सा आवारा बन/ मैंने खुद ही नष्ट कर दिए सघन वन/ मैं अपने ही लोगों के नरमुंडों से सुसज्जित था/ तो जीव-जंतु, जलचर-नभचर/ मेरे क्या लगते?/ मैं अहंकार के लावे में डूबा/ अब सोच रहा हूँ/ मुझे तुम्हें वह/ वसुधैव कुटुम्बकम लौटाना है/ मुझे तुम्हें वह लौटाना है। जो मुझे मिला था। जन्मदात्री माँ का स्नेह पूरी धरती माँ में रूपान्तरित हो जाता है। आदमियों की दुनिया में वानस्पतिक-जैविक रूपों में, संस्कृति के प्रवाह में अपनी आस्तिकता को छिटकाता हुआ। निश्चय ही कवि की भावयात्रा के ये सोपान जीवन और प्रकृति के सहकार में और बेहतर रिश्तों के लिए आस्था व दुनिया को रचते हैं।

ईमेल : balulalachha@yahoo.com

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