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‘इस समय तक’ : प्रवासी भारतीय की भारतीय कविताएँ



  • डॉ. नीलोत्पल रमेश

प्रवासी भारतीय धर्मपाल महेंद्र जैन का पहला कविता संग्रह ‘इस समय तक’ अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में धर्मपाल महेंद्र जैन की 78 कविताएँ संकलित हैं जिसमें कवि ने अपनी स्मृतियों के सहारे अपने देश और जन्मभूमि को महसूस किया है। धर्म जैन कनाडा के टोरंटो शहर में 1998 से रह रहे हैं। इसके पूर्व वे 1993 से 1998 तक अमेरिका में भी रह चुके हैं। वैसे इनका जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के रानापुर गाँव में हुआ था।

प्रवासी भारतीय विश्व के अनेक देशों में रह रहे हैं और वे अपनी रचनाशीलता को कायम रख हिंदी साहित्य के भंडार को समृद्ध कर रहे हैं। वैसे कई नाम हैं जो अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, जापान, सिंगापुर, फीजी, मॉरिशस, गियाना, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में रहकर हिंदी में लिख रहे हैं। वहीं से हिंदी की पत्र-पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं जिनमें उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो रही हैं। आवश्यकता यह है कि भारतीय साहित्य में भी उनकी रचनाओं को प्राथमिकता से मूल्यांकित किया जाए, ताकि उनका लिखा सार्थक हो सके। वह अपनी बोली-बानी को विदेशों में भी कायम रख सकें और अल्प ही सही माँ-भारती की समृद्धि में अपना योगदान दे सकें। ये भारत से बाहर रहकर हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, इन सबका यह प्रयास सराहनीय है। इनका हिंदी साहित्य में उल्लेख किया जाना चाहिए क्योंकि प्रचुर मात्रा में हिंदी साहित्य विश्व के अनेक देशों में लिखा जा रहा है। वे रहते तो विदेश में है लेकिन उनकी अभिव्यक्ति भारतीय परिवेश को वर्णित करने में सफल हो रही है।

धर्मपाल महेंद्र जैन के कविता संग्रह ‘इस समय तक’ में कवि ने अनेक उप-शीर्षकों के माध्यम से कविताएँ लिखी हैं। वे उप-शीर्षक हैं – माँ, प्यार, बेटी, शब्द, मेरा गाँव, प्रकृति, सत्ता, आदमी। इन्हीं उप- शीर्षकों के अंतर्गत धर्म जैन की 78 कविताएँ संकलित हैं। ‘माँ मैंने देखा’ कविता में कवि ने अपनी माँ को याद किया है कि किस प्रकार माँ ने मेरे हाथ को थाम कर शब्दों को लिखवाने की कोशिश की। वे शब्द अनगढ़ थे, फिर सुघड़ हो गए। कवि ने अपनी माँ को ईश्वर की अनंत लीला का सहयोगी कहा है। बचपन की स्मृतियाँ कवि के पास हैं, जैसे माँ का अंगुली पकड़कर चलाना, लोरियाँ सुनाना, शब्दों को आकार दिलाना आदि। ये सारी बातें कवि को याद हैं, तभी तो वह कहता है –

“याद है मुझे
तुमने रोपा था अक्षर पट्टी पर
हाथ थाम मेरा तुम चलाती रहीं चाक
चाक-सा
घड़ डाला अक्षर अनाकार-साकार
माँ मैंने देखा था तब
ईश्वर मेरा हाथ पकड़ कर लिख रहे थे।”

‘मैं प्यासा का प्यासा हूँ’ कविता में कवि ने प्यार की सुखद अनुभूतियों को याद किया है ‘प्यार’ एक ऐसा शब्द है जिसके एवज में कई पृष्ठ भरे जा सकते हैं। कवि ने प्यार को पाने की चाह में अपने को अक्सर खाली ही समझा है। ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं –

“अंतर कहता थाह नहीं है
पीड़ा है पर आह नहीं है।
कितना लम्बा पथ जीवन का
फिर भी इसकी राह नहीं है।
साथी बन कर आज तुम्हारा
मैं प्यासा का प्यासा हूँ।”

 ‘चाहता तो मैं भी था’ कविता में कवि ने कहा है कि मैं कठोर होना तो चाहता था, पर तुम्हें जान नहीं पाता। यही कारण है कि कवि अपनी प्रिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहा है, ताकि दुनिया को ठीक से जाना जा सके। कवि कहता है –

“चाहता तो मैं भी था
लौह कवच से जड़ित सीना और
पाषाण हृदय
पर मैं कैसे उतर पाता
तुम्हारे सुकोमल चित्त में
कैसे जान पाता कि
भीतर की गहराइयों में
धड़कता है दिल।”

‘मेरी किताब हो तुम’ कविता में कवि ने अपनी प्रिया को समझने-बूझने की कोशिश की है। वह किताब की तरह कभी अपनी प्रिया को उलट-पलट कर पढ़ना चाहता है ताकि वह प्यार के ढाई अक्षर को जान सके। कवि ने अपनी प्रिया को सृष्टि की श्रेष्ठतम संज्ञा दी है। ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं –

“कभी उलटता-पलटता हूँ
खोजता हूँ तुम्हें
बस पढ़ पाता नहीं
क्या करूँ
पढ़नी नहीं आती मुझे वह भाषा
जिसमें तुम लिखी गई हो
यह जानते हुए कि
सृष्टि की श्रेष्ठ भाषा हो तुम।”

‘बेटी के जन्म पर’ कविता में कवि ने अपनी बेटी के जन्म के समय का मार्मिक चित्रण किया है। वह कहता है कि प्रकृति भी तुम्हारे स्वागत के लिए इंतजाररत थी।

“मैंने सुना – गा रही थी हवा
मैंने देखा – थिरक रही थी झील
अलविदा कह रहा था झिलमिलाता सूरज
और धरती फैला रही थी बाँहें
तुम्हारे और चाँदनी के स्वागत में।”  

‘बार-बार लिख रहा हूँ’ कविता में कवि ने शब्दों की सत्ता का वर्णन किया है। कवि को शब्द चैन की नींद भी नहीं सोने देते हैं। जब वे जन्म लेते हैं तो कवि को बेचैन कर देते हैं कि मुझे लिखो, ताकि मुझे शब्दों की सत्ता में महत्त्व मिल सके। कवि कहता है –

“क्यों ऐसा होता है हर दिन
कि सुबह उठने पर
खड़े हो जाते है बहुत-से शब्द
जो रात से घेराव कर रहे थे
नहीं सोने दे रही थी उनकी नारे-बाज़ी
क्या मालूम क्या कहना चाहते थे वे
मैं उनींदा बेख़बर रहा उनकी बातों से
वे रेतीला तूफ़ान बन घुस गए आँखों में
उड़ा गए नींद।”

‘अंधेरे में टिमटिमाने’ कविता में कवि ने शब्दों के वंध्या होने की बात की है। वह कहता है कि अगर शब्द वंध्या होते तो मेरे अंदर किसी तरह की भावनाएँ नहीं जनमतीं और मैं सुविधाभोगी जिंदगी जी पाता। वह कहता है –

“एक रात सोचा था
शब्द तुम वंध्या होते तो अच्छा होता
दर्द-कुंठाएँ-कसक-तड़प
नहीं जनमतीं मुझमें
नहीं भोगतीं मुझे
इनके एहसास से परे
मैं जी रहा होता
सुविधाभोगी की ज़िंदगी।” 

‘अकाल में’ कविता में कवि ने अकाल की भयावह स्थितियों से पाठकों को रूबरू करवाया है। अकाल से जीव-जंतु ही परेशान नहीं होते पेड़-पौधे भी तबाह हो जाते हैं। माँ अपने बच्चे को दूध नहीं पिला पाती हैं, जिसके चलते उनके बच्चे उनका साथ छोड़ दे रहे हैं। वे इस दुनिया से कूच करने जा रहे हैं।

“कद्दावर बेटे-सा जवान बैल
दूधारी गाय-भैंस-बकरी
खा गया दुष्काल
या ले गए औने-पौने
बूचड़खाने के जमादार।”

‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ कविता में कवि ने अपने पिता को याद किया है। वह कहता है कि हमारे पिता ने हमें छोड़ दिया दुनिया में, ताकि मैं दुनिया की रीत सीख सकूँ और इस दुनिया में अपने पैरों पर खड़ा हो सकूँ।

“मेरी देह में
रोपा एक आदमी पिता ने
और उछारते हुए कहा
गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध पत्थर उछालने की
कोशिश जरूरी है
आने वाली पीढ़ी के लिए।”

‘ओ चिड़िया’ कविता में कवि ने चिड़िया के साथ मानवीय संबंधों की बात की है। चिड़िया का फुदकना, उड़ना, तिनके चुनना, घोंसला बनाना – ये सारी क्रियाएँ कवि को अच्छी लगती हैं। वह कहता है कि मेरी तस्वीर के पीछे जो तुम घोंसला बना रही हो, वह मेरे होने का एहसास दिला रहा है। कवि कहता है –

“अब नहीं बिखेरूँगा
तुम्हारा घोंसला वहाँ से
नहीं तोड़ूँगा तुम्हारी निष्ठा,
तुम्हारा प्रेम
तुम्हारी अदमित इच्छाएँ।”

‘धुंध में उंगली छूट गई तो’ कविता में कवि ने प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ के परिणाम स्वरूप घटित होने वाली घटनाओं की ओर संकेत किया है। वह कहता है –

“कोई डरा रहा है हमें
यह कह कर कि
सूरज नहीं आएगा एक दिन
ओज़ोन की परतों में पड़ जाएँगी गहरी झुर्रियाँ
कार्बन डाई ऑक्साइड के माफिया
सिलेंडरों में भर लेंगे सब प्राणवायु
धुंध में उंगली छूट गयी तो
नहीं खोज पाऊँगा तुम्हें मेरे बच्चे। ” 
 

‘उस समय से’ शीर्षक कविता में कवि ने सत्ता के परिवर्तन को ‘उस समय से इस समय तक’ की बारीकियों को बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से वर्णित किया है। सत्ता के खेल में उस समय से अब तक असंख्य लोगों की जानें गई हैं। कवि कहता है –

“करोड़ों भेड़ें लील गया महाभारत
कलिंग में बहीं खून की नदियाँ
धुँआ हो गया हिरोशिमा
वियतनाम, ईरान से सीरिया तक
आदमी ही कटा, गडरिए चलते रहे
उस समय से इस समय तक।”

‘सत्ता की देह में’ कविता में कवि ने देश की राजनीति में नेताओं की भूमिका पर सबसे बड़ा प्रश्न चिह्न लगाया दिया है। वह कहता है कि ये जनता को नहीं देखते हैं बल्कि अपना लाभ देखते हैं।

“बदलिये दल, जमाइये कुर्सी, बेचिये देश
भागिये सबसे तेज़, न हाँफिये नेताजी।

‘आधुनिकता का चेहरा’ कविता में कवि ने बाजारवाद की गिरफ्त में आती पीढ़ी की ओर पाठकों का ध्यान खींचा है। यह बाजार भी ऐसा है कि जो चीजें नहीं बिकतीं उन्हें मुफ्त में देकर अपना प्रभुत्व कायम रखता है।

“इच्छाओं का अवमूल्यन
बाज़ार को बेआबरू कर सकता है
इसलिए दुकानदार एक चीज़ ख़रीदने पर
सममूल्य दूसरी चीज़ भेंट करते है।”

‘इस समय तक’ की ये कविताएँ भी पाठकों को बाँधे रखने में सक्षम हैं – ‘भोपाल : गैस त्रासदी’, ‘प्रार्थना कुबूल हो’, ‘मुझे तुम्हें वह लौटाना है’, ‘आस्था की खातिर’, ‘रिश्तों के जाल में’, ‘नई पत्तियाँ आ रही हैं’, ‘साहबान!’, ‘बड़े भाई’, ‘भाषा बनने लगी हथियार’, आदि। धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएँ भारत में लिखी जा रही कविताओं से किसी भी मायने में कमजोर नहीं है बल्कि उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। भाषा, भाव, कहन और प्रतीक – सबकी दृष्टि से ‘इस समय तक’ की कविताएँ बेजोड़ हैं। पुस्तक की छपाई अच्छी है, प्रूफ की गलतियाँ नहीं है। इस अप्रवासी भारतीय कवि की कविताओं का हिंदी संसार में स्वागत किया जाना चाहिए व इनकी कविताओं की ओर पाठकों का ध्यान जाना चाहिए।

ईमेल- neelotpalramesh@gmail.com     

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