www.dharmtoronto.com साक्षात्कार व्यंग्य लेखन खुद को पवित्र या नैतिक सिद्ध करने की कला नहीं बने

व्यंग्य लेखन खुद को पवित्र या नैतिक सिद्ध करने की कला नहीं बने



कवि व व्यंग्यकार श्री धर्मपाल महेंद्र जैन से डॉ. सत्यवीर सिंह की बातचीत

बैंकिंग, अर्थशास्त्र, विज्ञान, पत्रकारिता तथा साहित्य की व्यंग्य विधा को नयी ऊँचाइयों पर स्थापित कर भारती के भंडार को भरने वाले, मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के साधारण गाँव में जन्में अपनी विलक्षण तथा बहुमुखी प्रतिभा के बल पर देश विदेशों में अपने कर्म व्यापार की छाप छोड़ने वाले धर्मपाल महेंद्र जैन कनाडा के टोरंटो शहर में रहकर हिंदी का समर्थ व्यंग्य लेखन कर रहे हैं। व्यंग्य; सत्ता, समाज तथा राजनीति के निरंकुश ऐरावत के लिए अंकुश सदृश्य है। बकौल धर्मपाल महेंद्र जैन, “अराजकता, अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता का विरोध प्रकट करने का प्रभावी माध्यम है- व्यंग्य लेखन।” व्यंग्य लेखन कोई फिलर न हो पर हमारी अभिव्यक्ति का पिलर हो। हम तटस्थ हो जाएँगे तो हम हाशिये पर चले जाएँगे, रचना या साहित्य नहीं। ऐसी ही भाव सरणियों से होकर गुजरती है श्री धर्मपाल महेंद्र जैन से डॉ. सत्यवीर सिंह की यह बातचीत

सत्यवीर सिंह : सर नमस्कार। आपके जन्म स्थल, पारिवारिक परिवेश तथा शिक्षा आदि का संक्षिप्त परिचय जानना चाहते हैं।

धर्मपाल महेंद्र जैन : नमस्कार सत्यवीर जी। आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के रानापुर गाँव में 1952 में जन्म और मेघनगर में स्कूली शिक्षा। मेरे दादा वरदीचंदजी जैन स्वतंत्रता सेनानी रहे तो देशप्रेम और स्वतंत्रता के किस्से-कहानियाँ खूब सुने। पिताजी ने ट्रक परिवहन व्यवसाय चुना तो बहुत घुमक्कड़ी और ट्रकों से लंबी-लंबी यात्राएँ कीं। ग्रामीण भारत की गरीबी, मजबूरियाँ और सीमाएँ सोच का हिस्सा बनती गईं और स्कूली दिनों में ही अखबारों में लिखना शुरु हो गया। झाबुआ से बी.एससी. और विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से भौतिकी में एम.एससी. की। इस बीच इंदौर के दैनिक स्वदेश के संपादकीय विभाग में कुछ समय काम किया और जैन सम्राट मासिक का संपादन भी। इस पड़ाव तक आते-आते उम्र इक्कीस साल हो गई।

मध्यप्रदेश (भारत) में जन्म और टोरंटो (कनाडा) में हाल निवास, इस सफ़र की कहानी आपकी जुबानी।

उज्जैन से टोरंटो तक की यात्रा में कई टप्पे खाये। दस से अधिक देशों की यात्राएँ कीं और लगभग पंद्रह गाँवों और शहरों में रहे। 1974 में एम.एससी. पूर्ण कर के उज्जैन में ही बैंक ऑफ इंडिया से जुड़ा। यहीं लोक साहित्य के अध्येता डॉ. बसंतीलाल जी बम के संपादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका शाश्वत धर्म में प्रबंध संपादक बना। प्रख्यात पत्रकार श्री राजेंद्र माथुर ने प्रोत्साहित किया तो नईदुनिया में व्यंग्य लिखने लगा। शुरूआती सालों में बैंक की सेवा और लेखन साथ-साथ चले। कथाकार हंसा दीप हमसफर बनीं, हम दोनों ने हमारी दो बेटियां शैली और कृति पाईं। जबलपुर के कृषि विश्वविद्यालय में बैंक ने प्रशिक्षण के लिए भेजा तो हरिशंकर जी परसाई से आत्मीय मुलाकात हुई और मेरा पहला व्यंग्य संकलन आया सर, क्यों दांत फाड़ रहा है। बैंक में पदोन्नतियाँ मिलती रहीं और हम दोनों के लिए लिखने का समय कम होता गया। हंसा जी हिंदी की सहायक प्राध्यापक बन गईं। बैंक के साथ चौबीस बरस रहा, आठ ट्रांसफर हुए, अंतिम ट्रांसफर था न्यूयॉर्क। न्यूयॉर्क में प्रबंधन के दबाव असहनीय हो गए तो मैंने बैंक को अलविदा कह दिया। उम्र हो गई पैंतालीस साल। हाँ, बैंक व भारतीय कौंसलावास के कारण मुझे संसदीय समितियों के साथ काम करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के अवसर मिले। न्यूयॉर्क में अमेरिकन एक्सप्रेस ने मुझे नौकरी का प्रस्ताव दिया पर मैं सरकारी पासपोर्ट धारक था, वीजा संबंधी कठिनाइयाँ बनीं तो मैंने सरकारी पासपोर्ट त्याग कर साधारण पासपोर्ट ले लिया और हम 1998 में कनाडा चले आए, इस प्यारे शहर टोरंटो में और तब से यहीं है। यह सफर बहुत मजेदार रहा और कड़ी से कड़ी चुनौती का मुकाबला करने का हौसला बना गया। 

स्वदेश से विदेश की तरफ कैसे बढ़े जबकि स्वदेश में कदाचित बहुत अवसर थे?

हंसा जी म.प्र. शासन की सेवा में थीं और मैं सरकारी उपक्रम में, तो हमारी नियुक्ति एक ही कस्बे या शहर में हो पाना संभव था। मैं किसी भी जगह सामान्यतः तीन साल रह सकता था, इसलिये यायावर रहे पर साथ रहे। 1993 में मेरा बैंक की विदेश सेवा में चयन हुआ और तैनाती मिली न्यूयॉर्क। भारत में मेरे लिए बहुत अवसर थे पर मेरी प्रतिबद्धता केवल बैंक और मेरे पारदर्शी काम के प्रति थी। उच्च पदों पर काम करने के लिए जो अनिवार्य अपेक्षा होती है दरबार में सोते-सोते बैठ कर हाँ करने की, वह मुझ में नहीं आ पाई, भारतीय दफ्तर संस्कृति के योग्य बनना मेरे लिए संभव नहीं था।

टोरंटो के वातायन से भारत कैसा दिखता है?

वर्तमान भारत बेहतर है और निश्चित ही और बेहतर बनेगा। आम सुविधाओं और समृद्धि में बढ़ोतरी हुई है। ग्रामीण जीवन पहले से अच्छा है, स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहतर है। फिर भी, दुनिया के उन्नत देशों के मुकाबले यदि अशिक्षा, बेरोजगारी, कानून, आर्थिक एवं अवसरों की असमानता और मानवीय अधिकारों की बात करें तो भारत निचली पायदान पर खड़ा दिखता है। निष्पक्ष हो कर देखें तो भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था लचर और खुदगर्ज नजर आती है। किसी देश की जनता अपनी योग्यता और क्षमता के हिसाब से सरकार चुनती है, भारत की हर सरकार यह बात अच्छी तरह से जानती रही है, इसलिए वह अपनी जनता को उतना योग्य और समर्थ नहीं बनने देना चाहती जितनी उसकी क्षमता है।

विज्ञान और अर्थशास्त्र के विलक्षण विद्यार्थी होते हुए आपका साहित्य की तरफ झुकाव, यह सब कैसे?

लेखन, बचपन से ही मेरी सूची में पहले रहा। अखबार में विज्ञान पर स्तंभ लिखते हुए एक दिन मैं भौतिकी अध्ययनशाला उज्जैन के अध्यक्ष डॉ. विद्या सागर दुबे से मिलने जा पहुँचा। उन्होंने मुझे भौतिकी में एम.एससी. करने का सुझाव दिया और सीएसआईआर की शोधवृत्ति का भरोसा भी। मैं अखबार  छोड़कर एम.एससी. करने उज्जैन चला आया। एम.एससी. पूर्ण होते-होते बैंक में चयन हो गया। मैं सीएसआईआर से जुड़ने की तैयारी कर रहा था तो मेरे पहले बैंक प्रबंधक श्री गाडगे ने कहा कि यहां छः सौ रुपये महीना पाते हो वहाँ चार सौ मिलेंगे। तुमको मैनेजर बनना है या प्रोफेसर। यहाँ रुपयों का गणित भारी पड़ गया। बैंकिंग में भविष्य बनाने के लिए मैंने एडवांस्ड बैंकिंग व अंतरराष्ट्रीय मुद्राबाजार में विशेषज्ञता हासिल की, और इसके उत्तम परिणाम भी मिले।

आपके कृतित्व की संक्षिप्त रूपरेखा तथा उल्लेखनीय कार्य

लगभग छः सौ रचनाएँ प्रकाशित हैं जिनमें मुख्य हैं कविताएँ और व्यंग्य निबंध। इनमें से कुछ सर क्यों दांत फाड़ रहा है व दिमाग वालो सावधान (व्यंग्य संकलन) तथा इस समय तक (कविता संकलन) में संकलित हैं। कुछ व्यंग्य और कविता संकलन प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। अखबारों के लिए लिखना शुरू किया तो सरल, सटीक और संक्षिप्त लिखने का सूत्र अपने संपादकों से मुझे मिला। यूँ अब तक प्रकाशित तीनों संकलन चर्चित हुए हैं, पर जो अब आना है वे और बेहतर और उल्लेखनीय होंगे ऐसी उम्मीद है।

आपके लेखन के प्रेरणा स्रोत तथा सृजन की भूमिका

अपने युवाकाल में मैं जैन दर्शन की दो पत्रिकाओं के संपादन से जुड़ा तो जैनाचार्य जयंतसेन सूरि जी के सानिध्य में जैन दर्शन पढ़ा-समझा। “जीवन उद्देश्य परक हो”, यह सूत्र उन्होंने मुझमें दृढ़ कर दिया। मुख्यतः मेरी रचनाएँ भावी पीढ़ियों को बेहतर दुनिया देने की कोशिश में उठती आवाज़ है। शिक्षा व अवसरों की बेहतरी तथा सामाजिक न्याय के लिए लिखी ये रचनाएँ आज के स्तर को ऊपर उठाना चाहती हैं। व्यंग्यकर्मी होने के कारण सतत सार्थक विपक्ष में बने रहना मेरी नियति है। ये दोनों विधाएँ मुझे अपने उद्देश्य-परक लेखन के लिए सलीके से अपनी बात कहने का सामर्थ्य देती हैं। लिखना मुझे मनुष्य के रूप में मनुष्य के समीप रहने को प्रेरित करता है। लिखना मुझे सामान्य और साधारण आदमी बने रहते हुए महत्तर सोच के लिए उकसाता है। सार्थक होने के लिए लिखने में हम खुद के ही प्रतिद्वंदी होते हैं इसलिए और बेहतर लिख पाने की कोशिश करता रहता हूँ।

आपके हास्यव्यंग्य बहुत उम्दा हैं। इस विधा में रुचि के पीछे की कहानी

अधिकांशत: यह गंभीर किस्म का व्यंग्य लेखन है। व्यंजना में हास्य, व्यंजना और शब्द की शक्ति को मुखर करने के लिए आता है, पर हास्य इस लेखन का मूल प्रयोजन नहीं है। हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं के सापेक्ष व्यंग्य अधिक समाजोन्मुखी है, इसलिये व्यंग्य की पठनीयता अधिक है। यह अपने समय के प्रति जागरूक रहने की अपेक्षा रखता है और समाज को सचेत करने का आनंद और अपने सार्थक बन सकने की दिशा देता है। व्यंग्य की सामाजिक मांग और मान्यता साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में बहुत अधिक है, शायद इसलिये मैं व्यंग्य लिखता हूँ। सचिन तेंदुलकर की शैली में कहूँ तो, बॉल मेरी सीध में आ रही होती है और मैं उसे देख कर, खींच कर दे मारता हूँ।

आजकल हास्यव्यंग्य के नाम पर फूहड़पन बहुत व्याप गया। कुछ तो ऐसे हैं, जिनको बच्चों को पढ़ने के लिए कह नहीं सकते।

आप सही हैं। जनमानस मनोरंजन के लिए पढ़ना और देखना चाहता है और प्रस्तुतकर्ता फूहड़पन के जरिये सस्ता मनोरंजन परोसते हैं। सस्ती चीज़ें, ज़्यादा और जल्दी बिकती हैं पर जल्दी ही टूट-फूट कर ख़त्म हो जाती हैं। मैं सिर्फ कबीर का उदाहरण दूँगा। उनके व्यंग्य में कहीं फूहड़ता नहीं है, न थोपा गया हास्य है, पर वे आज भी जनमानस और साहित्य में अपने संदेश के साथ ज़िंदा है और रहेंगे। फूहड़ और पॉर्न साहित्य क्षणिक रंजन है, उसमें उदात्त मानव जीवन के लिए दीर्घकालिक बौद्धिकता, विचार और इनसे उपजने वाला मस्त-मौलापन नहीं है।

हिंदी में हरिशंकर परसाई के बाद कदाचित कोई बड़ा व्यंग्यकार नहीं जन्मा। क्या मैं सही कह रहा हूँ।

यहाँ आपसे मेरी असहमति है। व्यंग्य को विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने का महत् कार्य हरिशंकर परसाई और शरद जोशी दोनों ने किया है। मनुष्यता के संरक्षण, सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों की रक्षा के लिए विवेकपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिए मैं परसाई जी का प्रशंसक हूँ। वे अपने लेखन में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ समाज के व्यापक प्रश्नों को उठाते हुए विद्रूपों पर खुलकर प्रहार करते थे। उनके व्यंग्य उत्तरोत्तर गंभीर और चिंतन प्रधान होते गए। वैचारिक प्रतिबद्धता के स्तर पर मेरा झुकाव परसाई जी की ओर अधिक है। उनका संघर्ष मैंने देखा है और मेरा पहला व्यंग्य संकलन ‘सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?’ उनकी संक्षिप्त-सी सार्थक भूमिका के साथ आया है। वहीं कथ्य, शिल्प और कटाक्ष के धनी शरद जोशी जी ने भी आम आदमी से प्रतिबद्ध होकर राजनीतिक चालाकियों, भ्रष्टप्रथाओं, पाखंडों आदि पर निरंतर प्रयोगधर्मी होकर तीखे प्रहार किए हैं। उनका व्यंग्य सहज, मारक, व्यापक एवं विस्तृत है। उन्होंने पत्रकारिता से लेकर टीवी और सिनेमा के माध्यम से आधुनिक व्यंग्य का दायरा बहुत विस्तृत किया है। शैली और व्यंजना के रचाव के मामले में शरदजी अपने अंदाज़े बयां के कारण मुझ पर छाये रहते हैं। शरद जी ‘प्रतिदिन’ लिखते थे। व्यंग्य की धार के प्रति उनका सचेत रहना ही उनके रचनाकर्म को सार्थक बनाता है। इस यात्रा को निरंतर गतिमान बनाए रखने में डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी जी का योगदान अहम है और उनका रचनाकर्म हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के साथ चलते हुए आगे के नये रास्तों की खोज भी करता है।

एक व्यंग्य लेखक को कलम साधना के लिए किनकिन बातों का ध्यान रखना होता है।

इस मामले में व्यंग्य लेखन के प्रति मेरा वैचारिक पक्ष रखना चाहूँगा। जो अनुचित है जैसे अराजकता अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता आदि इनके प्रति असहमति या विरोध प्रकट करने का प्रभावी तरीका है व्यंग्य। एक अनुशासन में सजग रहकर प्रहार करते हुए व्यंग्यकार को अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का निरपेक्ष और निष्पक्ष साधारणीकरण कर विसंगतियों, विद्रूपताओं और वर्जनाओं आदि का सशक्त विरोध करना चाहिए। इसका लक्ष्य बड़ा, गंभीर और दीर्घकालिक हो। व्यंग्यकार इस बारे में सतर्क रहे कि व्यंग्य लेखन खुद को पवित्र या नैतिक सिद्ध करने की कला नहीं बने, न ही यह वाद-विवाद, व्यक्तिगत आलोचना या निंदा हो। यह गाली-गलौज और ज्ञान का प्रदर्शन भी नहीं हो। व्यंग्य लेखन मुख्यतः समाज और समय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के साथ खड़ा होना है। यह कुछ कर पाने की समर्थता बने, कोई फिलर न हो पर हमारी अभिव्यक्ति का पिलर हो। कई व्यंग्यकार साथियों के रचनाकर्म में यह भाव केंद्र में है। उनका लेखन निरंतर और व्यापक है और वे असहिष्णु व्यवस्था में रहकर व्यंग्य लेखन करते हैं। उनके जुझारूपन को मैं सलाम करता हूँ।

आज साहित्य और साहित्यकार हाशिये पर हैं? इसके जिम्मेदार कौन हैं?

‘यश और वैभव पूर्ण जीवन जीने की ललक’ हमारे कार्य एवं व्यवहार की केंद्रीय धुरी है। आधुनिक साहित्यकार भी कहीं न कहीं यह सब चाहता है। बावजूद इसके, आज का साहित्य चाहे वह हिंदी या अन्य भाषाओं में हो, परिवर्ती साहित्य के मुकाबले भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर बेहद अच्छा है। यह कहना कि साहित्य और साहित्यकार हाशिये पर हैं, क्रूर राजनीति की सोची-समझी और ओछी चाल है। जब राजसत्ता पदच्युत होने लगती है तो यह साहित्य ही है जो अपनी वैचारिकता की लौ से समाज को फिर रास्ता दिखाता है। हम क्यों राजनेताओं के सम्मान और उनकी इच्छाओं को पुष्ट करने वाले लेखन को साहित्य मान लें और उनसे पुरस्कृत लेखकों को स्थापित साहित्यकार! यह तो सत्ता और विचारधारा के साथ हिलोरें मारते कभी केंद्र में आएँगे और कभी हाशिये पर। छद्म साहित्य असल को दबा देता है, पर छद्म साहित्य कुछ समय बाद अपना मूल्य खो भी देता है। कई बार हम ऐसी किताब या आलेख पढ़ते हैं या फिल्म देखते हैं जो हमारे दिमाग़ पर छा जाती है। रचना यह काम करती है। हम तटस्थ हो जाएँगे तो हम हाशिये पर चले जाएँगे, रचना या साहित्य नहीं। जहाँ तक ज़िम्मेदारी की बात है, प्राथमिक ज़िम्मेदारी भारतीय शिक्षा पद्धति की है जो विश्लेषण और तर्क के बजाय रटना सिखाती है। साथ ही, हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था भी जिम्मेदार है जिसमें तुरंत धनपति बनने की होड़ है।

आपने संपादन किया, राजभाषा और सांस्कृतिक समिति के सदस्य भी रहे। साथ ही देश-विदेश के समाजों, सत्ताओं को जानने का अनुभव भी बहुत है। ऐसे कौनसे कारक हैं, जिनके चलते हिंदी को वह हक नहीं मिला जिसकी वह हक़दार है।

आजादी के पूर्व और बाद के कई दशकों तक भारत में व्याप्त अशिक्षा ने वोट बैंक की राजनीति को पाला-पोसा। इस कारण देश क्षेत्रीयता और जातिवाद के गड्ढे से कभी निकल नहीं पाया और न ही राजनीतिक इच्छा शक्ति बना पाया। जो संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा भाषा बन सकती है, वह हिंदी क, ख, ग, घ क्षेत्रों में बँटे बिना सच्ची राजभाषा बन सकती थी। जब चाहिए था तब राष्ट्रवाद नहीं था, अब राष्ट्रवाद है तो धार्मिकता का अनियंत्रित उन्माद है। दूसरा कारण तकनीकी है। बॉलीवुड की हिंदी समावेशी है और सरल भी, पर साहित्य की हिंदी कठिन। सरलीकरण की बात करें तो सिद्धांत-शास्त्री टपक जाते हैं और मानकीकरण की बात करें तो सरकारी खाऊओं की फौज खड़ी हो जाती है। भाषा बोलने-पढ़ने-लिखने वालों से बनती है, भाषा अकादमियों से नहीं बनती। तीसरा कारण बाज़ारवाद है। हिंदी कमाऊ नहीं है, तरक्कीदाता नहीं है, पांडित्य का आडंबर नहीं है। यह बहुत बड़े जन समुदाय की भाषा है जो अधिकांशतः आर्थिक रूप से निम्न मध्यवर्गीय या निम्न हैं और जिनकी आवाज़ पाँच साल में एक ही बार मायने रखती है।

टोरंटो में साहित्य की जमीन उर्वर है या ऊसर? भारतीय जनमानस को टोरंटो से क्या सीखना चाहिए।

टोरंटो में दुनिया का हर देश धड़कता है, हर देश के झंडे फहराते हैं और उनके स्वाधीनता दिवस मनाये जाते हैं। विश्व की लगभग एक सौ साठ भाषाएँ यहाँ बोली जाती हैं। अस्सी से अधिक भाषाओं के अखबार और पत्रिकाएँ निकलती हैं जिनमें भारत की ही दस से अधिक भाषाएँ शामिल हैं। इसलिए हर भाषा के सक्रिय लेखक यहाँ हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नैतिकता का ही अंकुश है, इसलिए अभिव्यक्ति के स्तर भी व्यापक हैं। बहुल संस्कृति वाले इस शहर में सैकड़ों धर्म के लोग रहते हैं, वे इस देश के कानून का सम्मान करते हैं और परस्पर सद्भाव रखते हैं। विश्व के पाँच सर्वश्रेष्ठ शहरों में लगातार बने रहने के लिए मेहनत तो लगती ही है।

हिंदी की स्थिति – टोरंटो की लगभग पंद्रह सरकारी स्कूलों, तीस निजी संस्थाओं और तीन विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाने की व्यवस्था है। हाँ, यहाँ सौ से ज़्यादा हिंदी कवि हैं। माइक मिल जाये तो एक कवि पूरे दिन रचना पाठ कर सकता है। अपना क्रम आने तक हर कवि सहिष्णु और उर्वर है, फिर भाग जाता है। यहाँ साहित्य की मौखिक परंपरा समृद्ध है। भारत से दूर हम बिना टोपी के भी एक-दूसरे की टोपी उतार कर खुश रहते हैं।

धन्यवाद सर। आपका सहयोग तथा आशीर्वाद सदैव बना रहे। आपका स्नेहाकांक्षी

आपसे यह बातचीत बड़ी रोचक रही, इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

(सेतु मासिक के मई 2020 अंक में)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *