Category: लेखन

‘इस समय तक’ में प्रकृति निरूपण‘इस समय तक’ में प्रकृति निरूपण

के. पी. अनमोल हिन्दी कविता और प्रकृति का बहुत पुराना संबंध रहा है। यह संबंध मानव इतिहास के लगभग प्राचीन संबंधों में एक होना चाहिए क्योंकि मानव-बोध ने जब आरम्भ में आँखें खोली होंगी तो सबसे पहले प्रकृति को ही ...

‘इस समय तक’ : प्रवासी भारतीय की भारतीय कविताएँ‘इस समय तक’ : प्रवासी भारतीय की भारतीय कविताएँ

डॉ. नीलोत्पल रमेश प्रवासी भारतीय धर्मपाल महेंद्र जैन का पहला कविता संग्रह ‘इस समय तक’ अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में धर्मपाल महेंद्र जैन की 78 कविताएँ संकलित हैं जिसमें कवि ने अपनी स्मृतियों के सहारे अपने देश और ...

प्रवासी कवि की कविताएँ – प्रकृति और जीवन के सहकार के लिएप्रवासी कवि की कविताएँ – प्रकृति और जीवन के सहकार के लिए

प्रो. बी.एल. आच्छा धर्मपाल महेन्द्र जैन से मेरा साक्षात्कार उनके व्यंग्यों की मार से ही हुआ है। इतने चुभते-चुभाते काँटों के बीच ‘इस समय तक’ का काव्य राग सर्वथा अलहदा है। ये कविताएँ जितनी राग वत्सल हैं, उतनी ही अपने ...

इंडियन पपेट शोइंडियन पपेट शो

(विधानसभा थियेटर खचाखच भरा हुआ था। महामहिम राज्यपाल, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और मुख्यमंत्री प्रथम पंक्ति में विराजमान थे। यह विधानसभा सत्र नहीं था पर होहल्ला वैसा ही था। संगीत की फुहारें उठीं और दर्शक चुप होने लगे। स्पीकर ...

बापू का आधुनिक बंदरबापू का आधुनिक बंदर

गुजरात का नाम आए तो सबसे पहले बापू का नाम आता है, फिर फाफड़े, ढोकला, फरसाण और बापू के तीन बंदर। अब हाईटेक जमाना है, बंदर आदमी से ज़्यादा बुद्धिमान हो गए हैं। बापू इस समय होते तो तीन की ...

दाल-बाटी और चूरमादाल-बाटी और चूरमा

दिल्ली में बहुत धुंआ भर जाता है, और आकाश में धुंध। किसी को साफ़-साफ़ नहीं दिखता। राजनीति अंधी हो गई है और कूटनीति बहरी। अर्थनीति, व्यर्थनीति साबित हो रही है। नोटबंदी, कालेधन की नसबंदी नहीं कर सकी है तथा जी ...

बादलों को चखने का समयबादलों को चखने का समय

जब बारिश में भीगना चुनता हूँ बेपरवाह हो जाता हूँ नहीं देखता तब कि कितना भरा है बादल कितनी तीखी हैं बौछारें कितनी तेज़ है हवा। अभिषेक की धार देखने के लिए ध्यानमग्न हो जाती हैं आँखें मुँह अपने विस्तार ...

आदिवासी होस्टल के बच्चेआदिवासी होस्टल के बच्चे

घर की कच्ची दीवारों में कभी गूंजी नहीं कोई प्रार्थना यहाँ सुबह शाम ज़ोर से गाना होती हैं प्रार्थनाएँ ताकि मास्टरजी को लगे बच्चे संस्कृति से जुड़ रहे हैं आदिवासी बच्चे हैं उनको रहना है भगवान भरोसे ही। घर के ...

आधुनिकता का चेहराआधुनिकता का चेहरा

मॉल में हमें कुछ ख़रीदना नहीं होता चीज़ों को उलटने-पलटने और कीमतें देखने के सिवा। श्रृंगार कविता-सी सजी-धजी मॉल फ़ुरसत के वक़्त में रूमानी बना देती है इसके चलते कागज़ का अधिकृत टुकड़ा अर्थशास्त्र बन जाता है। मॉल में कई ...

अ – अधिकार काअ – अधिकार का

वह था ग़रीब क्या मालूम ग़रीब पैदा हुआ था या हालात् ने कर दी थी यह हालत कुछ तो हुआ होगा अन्याय वरना उसके हिस्से भी वही सूरज था वही नदी थी, वही हवा थी फिर कहाँ हो गई चूक? ...