Category: व्यंग्य

थानों की मुहर बंद निविदाएँथानों की मुहर बंद निविदाएँ

सभी डिवीजनों के विशेष थानों में थानेदारों की पोस्टिंग करने हेतु प्रशासनिक सुविधा के लिए मुहर बंद निविदाएँ आमंत्रित की जाती हैं। ये निविदाएँ ‘आइटम रेट’ पर ‘कम्पेटिटिव बिडिंग’ के अंतर्गत बुलाई जा रही हैं। इसमें ए, बी एवं सी ...

इंडियन पपेट शोइंडियन पपेट शो

(विधानसभा थियेटर खचाखच भरा हुआ था। महामहिम राज्यपाल, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और मुख्यमंत्री प्रथम पंक्ति में विराजमान थे। यह विधानसभा सत्र नहीं था पर होहल्ला वैसा ही था। संगीत की फुहारें उठीं और दर्शक चुप होने लगे। स्पीकर ...

बापू का आधुनिक बंदरबापू का आधुनिक बंदर

गुजरात का नाम आए तो सबसे पहले बापू का नाम आता है, फिर फाफड़े, ढोकला, फरसाण और बापू के तीन बंदर। अब हाईटेक जमाना है, बंदर आदमी से ज़्यादा बुद्धिमान हो गए हैं। बापू इस समय होते तो तीन की ...

दाल-बाटी और चूरमादाल-बाटी और चूरमा

दिल्ली में बहुत धुंआ भर जाता है, और आकाश में धुंध। किसी को साफ़-साफ़ नहीं दिखता। राजनीति अंधी हो गई है और कूटनीति बहरी। अर्थनीति, व्यर्थनीति साबित हो रही है। नोटबंदी, कालेधन की नसबंदी नहीं कर सकी है तथा जी ...

लगे रहो मेरे भाईलगे रहो मेरे भाई

सुबह से डेटा आ रहे हैं। थोक में आ रहे हैं पर मुफ़्त में आ रहे हैं और मेरे मोबाइल में भरते जा रहे हैं। सरकारी ख़जाने में टैक्स भरते जाओ, भरते जाओ, पर उसका पेट नहीं भरता। मेरे मोबाइल ...

इकत्तीसवीं सदी मेंइकत्तीसवीं सदी में

यह व्यंग्य में इकत्तीसवीं सदी में लिख रहा हूँ, ईसवी सन तीन हज़ार बीस में। आधुनिक व्यंग्यकार टाइम मशीन के सहारे एक हज़ार साल पीछे लौट सकता है। बस इसी भूतदृष्टि के सहारे मैं इक्कीसवीं सदी की बात कर रहा ...

साहित्य की सही रेसिपीसाहित्य की सही रेसिपी

इन दिनों साहित्य में रस नहीं रहा, निचुड़ गया है। साहित्य क्विंटलों में छप रहा है और सौ-दो सौ ग्राम के पैकेट में बिक रहा है। जगह-जगह पुस्तक मेलों में बिक रहा है पर रसिकों को मज़ा नहीं आ रहा। ...

जंगल : सरकारी जंगले मेंजंगल : सरकारी जंगले में

आला अफ़सरों के जंगले में हर सरकारी नीति जंगल होती है। फिर, जंगल बीड़ में बदल जाता है। और अफ़सरान अपने पालतू चमचों के माध्यम से सारी बीड़ चर जाते हैं। इन दिनों देश में जंगल लगाने का काग़ज़ी काम ...

क़लमकार! नारे रचोक़लमकार! नारे रचो

गोष्ठीजीवी साहित्यकारों, बहुत दिन हो गए होंगे साहित्य रचे। कोई नया वाद ही नहीं निकाला। बिना वाद के वाद-विवाद नहीं होता। लिखो भी तो क्या? परजीवी संपादकों, महीनों हो गए होंगे कुछ नया साहित्य पढ़े। नए साहित्यकार घटिया लिखते हैं ...

ब्रीफकेस प्रसंगब्रीफकेस प्रसंग

मैं दफ़्तर में नया-नया हूँ और दफ़्तर की संस्कृति समझ रहा हूँ। जब कभी, जहाँ कहीं ब्रीफकेस देखता हूँ, भक्त मुद्रा में मैं श्रद्धा से भर जाता हूँ। ब्रीफकेस का स्वरूप कभी मुझे जादुई लगता है तो कभी दैविक। अस्थाना ...