Kuchh Sam Kuchh Visham

कुछ सम कुछ विषम

आईसेक्ट पब्लिकेशन 

25-ए, प्रेस कॉम्प्लेक्स, जोन-1, एम. पी. नगर,

भोपाल 462011, फोन- 755 4923952

aisectpublications@aisect.org 

आमुख से

धर्मपाल महेंद्र जैन का यह संग्रह प्रवासी भारतीय लेखकों के साहित्य के बीच एक सुखद प्रतीति की तरह है। इन पंक्तियों में एक सघन समकालीन स्वर विन्यस्त है -

                                                                    

उन्होंने गांव को सहेज रखा है / एक डेटा फाईल में / जिसका नाम है विस्थापित  786. 

  *

पेड़ से चिपक गई है मां / छोटी-छोटी बांहों और नाजुक सी देह के साथ /पगली कहीं की.

  *

आतंकियों सुनो / चार्ली हेब्दो की इमारत कह रही है / अख़बार की जीभ काटोगे

करोड़ों शब्द निकल आएंगे / अपने शब्दकोशों से.

         

धर्मपाल की कविताओं में समकालीन कविता के अधिकांश सरोकार हैं। जैन दर्शन की शिक्षा से प्राप्त सृष्टि की पक्षधरता आधुनिक संवेदनात्मक ज्ञान की भाषा में है यथा- 'हैशटेग बन गया था ख़तरनाक पेड़/ इसलिए काट दिया' अथवा 'पी पी ई के भेष में यह जानना मुश्किल है/ कि डाक्टर के चेहरे पर/ संवेदना की कर्क रेखा कहां से गुजरती है'। यह जहां आज के प्रसंगों से रूबरु है वहीं परंपरा से अपने को विलग नहीं करती। वैज्ञानिक चेतना से संपन्न इन कविताओं में इधर की दुनिया के हवाले  गहरे राजनीतिक आशयों के साथ हैं। उनके देखने में ऐसा बांकपन है जो प्रवासी कवियों में कम दृष्टव्य है।

   

दुनिया में एक ही देश होना चाहिए था / वाशिंगटन डी सी / 

एक ही घर होना चाहिए था / व्हाइट हाउस

एक ही आदमी होना चाहिए था / डानाल्ड ट्रंप.

 *

मैं डायनासोरों की राजधानी ड्रमहेलर, कनाडा में हूं.


जातीय स्मृतियों के साथ कवि का विश्वबोध आश्वस्त करता है कि प्रवासी साहित्य का यह स्वर ग़ौरतलब है। इसमें प्रेम की इबारतों में नायग्रा जलप्रपात से भेड़ाघाट का राग कुछ यूं आकार लेता है -'भेड़ाघाट में जो राग सुना था मध्दम-मध्दम/नायग्रा में सुर वही है'। इन कविताओं में मनुष्यता के गान हैं। ये धरती से लेकर ब्रम्हांड के लिए फिक्रमंद दिखती हैं। वे कहते हैं- 'ब्रम्हांड का अनंत खोजने की संभावना ज़िंदा है'

लीलाधर मंडलोई

प्रमुख मंतव्य

समकालीन कविताओं का सशक्त दस्तावेज

कवि के पास दृष्टि की गहराई और जीवन की व्यापकता है। लेखक की रचनाओं की विशेषता है कि बरसों से वे विदेश में रहकर भी अपनी हर सांस में भारत को जीते है। धर्मपालजी की कविताओं का फलक व्यापक है। धर्मपाल जैन सामाजिक सरोकारों के कवि हैं। इनकी कविताओं में सामाजिक-मानवीय संबंधों के प्रति गहरी चिंता दिखाई पड़ती है। इनकी रचनाओं में व्याप्त स्वाभाविकता, सजीवता और मार्मिकता पाठकों के मन-मस्तिष्क में गहरा प्रभाव छोड़ने में सक्षम है। 

“तटस्थ समय” रचना व्यवस्था के विरूद्ध मुखर है। कवि ने समाज में फैली बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया है। इस कविता की ये पंक्तियां इसे अभिप्रमाणित करती हैं - जंगल का काठ / कुर्सी बनकर / जंगल हथिया लेता है। / कलमकार / नौकरी से बंध कर / शोषण को / जायज लिखने लगता है। / तिहाड़ जाती सड़क / संसद की ओर / मुड़ जाती है।

यह समकालीन कविताओं का एक सशक्त दस्तावेज़ है। धर्मपाल महेन्द्र जैन की रचनाएँ हृदय को बड़ी ही गहराई तक स्पर्श करती हैं तथा पाठक के अंदर एक बेचैनी को जन्म देती है। संग्रह की सभी कविताएँ कथ्य और शिल्प के दृष्टिकोण से नए प्रतिमान गढ़ती है। संप्रेषणीयता के स्तर पर धर्मपाल जैन की कविताएँ खरी उतरी हैं। अच्छी कविताएँ पढ़ना चाहने वालों के लिए यह एक पठनीय संग्रह है।   

छत्तीसगढ़ मित्र, अक्टूबर 2021

बतियाने को लालायित हैं कविताएँ

सात समंदर पार रहकर भी हिन्दी ‘माय’ की सेवा में समर्पित रहने वाले प्रवासी कलमकार धर्मपाल महेन्द्र जैन की काव्य पुस्तक आयी है- ‘कुछ सम कुछ विषम’। इसमें 91 कविताएँ हैं, जो अलग-अलग मिजाज की हैं, लेकिन हर कविता पाठकों को उद्वेलित करने की क्षमतावान है। धर्मपाल महेन्द्र जैन की कलम राह दिखाती है, ताकि भविष्य को ‘सुयोग्य’ बनाया जा सके। पीड़ा को अभिव्यक्त करती है, ताकि स्वर को ‘गति’ मिल सके। कलम वर्तमान को आगाह करती है, तो भविष्य के लिए फिक्रमंद है। ‘कुछ सम कुछ विषम’ से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि कविताएँ आपसे बतिया रही है, कुछ कहना चाह रही है।

कविता क्या है? कविता कैसी होनी चाहिए? कवि ने बहुत सुंदर वर्णन किया है। कविता भावों की अभिव्यक्ति है। भाषा सरल हो, सहज हो, ताकि कविता अंतिम जन तक अपनी पैठ बना ले। कवि ने लिखा कि कविता गिनती की तरह सरल होनी चहिए। यदि कोई एक अंक बोले, तो अगला स्वतः अपने क्रम में आ जाये। एक-एक को जोड़कर कविता अनंत तक पहुँच जाये। संख्या चाहे सम हो या विषम। शायद कवि ने इसी वजह से इस पुस्तक का शीर्षक रखा है- कुछ सम कुछ विषम। आज कविता को बंद कमरों से निकालने की जरूरत है, ताकि कविता शंखनाद करे।


गिनती की तरह अपने अंकों से / शून्य को अर्थ देती हो कविता

कि वह सबसे आगे खड़ी हो जाए / जब शून्य करार दिए जा रहे हों लोग।

युगीन यातनाओं को रेखांकित करती कविताएँ


- डॉ.  मनोहर अभय

कुछ भी कहें कवि की वैज्ञानिक चेतना श्लाघनीय है। उसने वैज्ञानिक प्रगति को मानवीय उन्नयन की दृष्टि से देखने का जो प्रयास किया है, वह एक लम्बे रास्ते का उन्मेष है। ऐसा उन्मेष जिसमें संघर्षशील आदमी की जिंदगी पर पड़ने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक दबावों का शब्दांकन है। राग-रंग से भरी रागात्मकता है। सृष्टि का इन्द्रधनुषी सौंदर्य है। और है छल-छद्म से प्रदूषित व्यवस्था के अठ्ठे-पंजे। न्याय, समता, स्वायत्तता, शोषणमुक्त समाज की सौगंध खाने वाले सत्ताधीश कैसे घिरे रहते हैं दरबारियों से...

 ''शहंशाह ने कहा कानून लिखो \ जी हुजूर, लिखा... -न्याय की उम्मीद में तालियाँ बजीं इतनी कि \ हवा हिलने लगी \ प्रजा के शब्द गिर गए \ जड़ गए राजसी शब्द... इसे वे निकाल कर दिखाते हैं \ और फिर जेब में रख लेते हैं''। 


कवि के शिल्प-विधान की अपनी छटा है। भाषा में प्रवाह है। प्रसंगवश अंग्रेजी, अरबी-फारसी के शब्दों के प्रयोग ने कथ्य को अधिक जीवंत और प्रभावी बना दिया है। इससे भी ऊपर है व्यंग्य और कटाक्ष का पैनापन, जो पाठक को तिलमिलाहट के साथ कुछ सोचने को मजबूर करता है। इतिहास, पुराणों और लोकोक्तियों से उठाए मिथक हैं यथा 'राजा मिदास', गांधारी आदि। यहाँ आप देख सकते हैं अदृष्ट 'हवा का रंग', 'पहाड़ों पर चढ़ती नदी', ' रैंप-वॉक करते पंछी', 'शब्दों की देह' आदि। सच कहा जाय तो प्रस्तुत संकलन युगीन त्रासद यातनाओं की मर्मस्पर्शी कहानी है।

शून्य को आकार देती कविताएँ 


डॉ. नीलोत्पल रमेश

आज की कविताओं पर कई आक्षेप लगाए जा रहे हैं, कुछ तो ‘कविता का अंत’ घोषित कर चुके हैं। वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। आज भी कविताएँ पहले से सशक्त रूप में हमारे सामने आ रही हैं। समकाल की कविताएँ अपनी शैली, कहन, बिंब, प्रतीक आदि में नयापन लिए हुए प्रस्तुत हो रही हैं। यह ‘कविता का अंत’ नहीं बल्कि कविता की समृद्धि का समय है। धर्मपाल की कविताएँ भी हिंदी कविता की समृद्धि की सूचक हैं।


गिनती के अंक सम और विषम दोनों को साथ लेकर चलते हैं, उसी तरह कविता भी सामान्य और विशेष को साथ ले कर चलती है। जब सामान्य जन को शून्य माना जाने लगे तो कविता उनके साथ आगे खड़ी हो कर उन्हें सबल बनाती है। कवि ने लिखा है-

गिनती की तरह सम और विषम को /  साथ लेकर चलती हो कविता / कि कैसा भी हो अंक/

एकमेक हो जाए संख्या बनाने में।  गिनती की तरह अपने अंकों से / शून्य को अर्थ देती हो कविता /     कि वह सबसे आगे खड़ी हो जाए / जब शून्य करार दिए जा रहे हों लोग। 

‘लेक ओंटेरियो’ कविता के माध्यम से कवि अपने राज्य ओंटेरियो (कनाडा) की झील के प्राकृतिक सौंदर्य को बहुत नजदीक से महसूसते हुए अभिव्यक्त करता है। वह उसे अपनी अंजुलि में भर लेता है और लेक ओंटेरियो उसके अंदर रच-बस जाती है। ये भाव देखिए-


कैसा रोमांच है यह / कि तुम नायग्रा जलप्रपात को / अपने भीतर भर / अटलांटिक महासागर तक /

छोड़ आती हो और / जब मैं तुम्हारे तट पर होता हूँ / तुम मेरी अंजुलि में भर जाती हो।